ये कैसे रहती हैं। कितनी कम पढ़ी हैं। कई माताएँ बिलकुल नहीं पढ़ी हूं ,
देखो उनको। इनका कमरा कैसा मिलेगा, बिस्तर कसा मिलेगा, पात्र
मिलेंगे, शौचालय को देखकर आओ, स्नानागार को देखकर आओ, मटके
देखकर आओ, सीखो इनसे। ये प्राथमिक चीजें हैं।
अपने मन में कल्पना कीजिए कि मनमोहन सिंह जी यहाँ आ जाएँ याँ
नरेन्द्र मोदी जी आ जाएँ कि आचार्य ज्ञानेश्वर जी आपका नाम बहुत स
तथा। आपके विद्यालय को देखना है और आपके कमरे में जा घुसे तो वह
देखेंगे। व्यक्ति को इस प्रकार विचार करना चाहिए। ये मुख्य बातें हैं।
ध्यान रहे कि आप बाह से व्यवस्थित हो तो आपका मन में

व्यवस्थित बनाता है, प्रसव होता है, प्रोत्साहन मिलता है। यदि
बाहर से अव्यवस्थित हो तो हमारा मन भी अव्यवस्थित रहता है। ये मैंने आपको
अपनी र से कुछ व्यावहारिक बाते बताई।
मैं आपको और व्यावहारिक बातें बताना चाहूंगा। मैं कईयों को ऐसे भी
देखता हूँ जिनको व्यावहारिक ज्ञान के विषय में बहुत कम संस्कार है। एक
उदाहरण दे रहा हूँ कहीं से भी कोई वस्तु उठाई, उसका अपने लिये प्रयोग
किया, किसी और के लिये वस्तु किसी और को दी, तीसरे को दी, चौथे को
दी। अब जहाँ से वस्तु उठाई गई है वहाँ पर वस्तु तही एहुँची
है, तो उत्तरदायित्व से हीन छौंक छम देषी बन जाते है। ये त्रुटि
संस्थाओं में इतनी अधिक मात्रा में छोटी है कि इसकी कोई कव्पना
छी रही है।
हम 13 व्यक्ति दिन में पचासों वस्तुओं को उठाकर के यहाँ से वहाँ,
वहाँ से यहाँ करते हैं। और उनको समुचित स्थान के ऊपर ठीक प्रकार से
रखते नहीं है। अपने दायित्व को समझते नहीं हैं। ऐसी त्रटियाँ प्राय: सबर
#ती है। किसी से कम, किसी से अधिक शीघ्रता में, किसी कार्य विशेष के
आ जान से गलती होना एक अलग बात है, लेकिन व्यक्ति का स्वभाव ।
बना हुआ है कि वह जो वस्तु जहाँ से उठाता है, वहाँ उस वस्तु को प्रायः रख
नहीं है अथवा जहाँ जाकर उस वस्तु को देने का, रखने का, पहुँचाने का उप
दायित्व है, वहां उसको व्यक्ति पहुँचा नहीं पाता। ये मैंने आपको सामान्य व
दवाई।

इसी से संबंधित एक. बात और बताई थी कि कुछ कार्य ऐमे छोते ।
हैं जो व्यक्ति का दायित्व न सौप छोटे पर भी उसका उसे

पT तायित्य छोा जाता छ। काम किताहति के बाद हि इतकी अनझूति-
छोटी छ। उदाहरण वे रहा हूँ- रूब जोर से बरा हो पई। आप या तो पद़
रहे हैं, या वर्षा के देख रो ै या कि्राम कर रहे ह या अपना कोड और
क्रियाकलाप
कार रोष हैं। आप भी आये ही नहीं। नीचे किसान खदी महं।
* से वर्षा आई और कमरे में पानी आ गया। सतरगी (दशी)
भीग गई कालीन भीग गया। आप राव आते हैं। लेकर
कुछ कुख होता है, पीड़ा होती है, कष्ट होता है। आप सोचते हैं कि ये दत
गलत काम हो गया। ये सामान भीगने नहीं चाहिये थे।
यदि आपके मन में इस प्रकार की अनुभूति होती है तो समझना चाहियि
कि हमारा उस चीज को देखने का और उसकी सुरक्षा का कर्तव्य था। हमारा
कर्तव्य था कि ये काम ऐसा न हो, बिगड़े नहीं, हानि न हो।
क्या आपको आसपास, ऊपर-नीचे, दायें-बायें देखकर के ऐसा लगता है
कि वस्तुयें खराब हो रही हैं, बिगड़ रही हैं। वे व्यवस्थित नहीं रखी हुई है,
टट-फूट रही हैं, गल रही हैं, सड़ रही है, बेकार हो रही हैं, अस्त व्यस्त पद़ी हैं,
उनका उपयोग नहीं हो रहा है। आप ये अनुभूति करते हैं तो समझना चाहिये
कि आपके अंदर सामाजिक कर्तव्य की भावना है। ये व्यक्तिगत कर्तव्य नहीं है
समय पर उठना, समय पर ध्यान, समय पर व्यायाम, समय पर भोजन
समय पर निदिध्यासन, समय पर पाठ, आप सब कुछ ठीक करते हैं। इस प्रक
आपके अंदर व्यक्तिगत कोई दोष नहीं है, लेकिन व्यक्तिगत दोषों से रहित हो
का पर व्यक्ति सामाजिक, संस्थागत और राष्ट्रीय कर्तव्यों से बच नहीं सकता।
हमें जहां व्यक्तिगत निर्माण कंपनी है, वहाँ समाज का, राष्ट्र व
== भी निर्माण करना है। में व्यपरथा संबंधी, प्रबंध सम्बत्ध
– ज्ञान-विज्ञान प्राप्त होना चाहिये। हम सावधानी रखेंगे फिर भी नुकसा
होगा, हानि होगी। बच नहीं सकते हम।

अपनी पढ़ाई, भोजन, विश्राम, व्यायाम, ध्यान सब कुछ छोड़कर केव

S

मत्र इस काम में लगे रहें कि किसी का नुकसान न हो, फिर भी नुकसान होग
जात भी सत्य है कि होगा ही नुकसान। लेकिन ऐसा नुकसान न हो जो दि
युभ, जिसको देखकर के मन में ज्यादा दु:ख हो, ग्लानि हो. पश्चाताप ।
में आपको एक उदाहरण दे रहा हूँ ।

आपको मैं पहले ये बताना चाहता हूँ कि मुझको किसी वस्तु के प्रति
रसी है। मेरे को वस्तु के नष्ट होने का दु:ख नहीं होता है।