1) ता-पिता पर निर्भर ने वाले भारतीय विद्यार्थी माता-पिता
के धब् क्षे पढ्फर यद्दे धन कमाने मे अच्छा पुल दरे ज्यें तो पिर जनकी गोय-
में जाह बेठ्े ढे। धपने पैरोें के बल एर विद्यन्ध8्यय्यन करत में खड़े दरेके
क् प्रयत्न करून चाहहिनिण क्योंके चौडरीष्रों धन्धे पढ़ाई नटी प ए व्ापतेी।
रूशलिए नाचार्यकिर रामलखन का पाठ पढ़ाने देतु कटते थे-

पार्ट टाइम काम करना चाहिए।

विदेश में रहने वाले व्यक्ति पार्ट टाइम जॉब भी करते हैं और पार्ट दाइ
स्टडी (पढ़ाई) करते हैं। विदेश में मैंने यह देखा है। अपने देश में भी कुछ थो
व्यक्ति है जो रात को पढ़ते हैं और सुबह ड्यूटी करते हैं। सुबह पदाई करते हैं तु
रात में छह से आठ घण्टे इयूटी करते हैं। इस प्रकार वे काम भी करते है और पटा।
भी करते हैं। हमारे देश के अधिकांश विद्यार्थी और ब्रह्मचारी न तो कमाई करते हैं
न घर और संस्था का काम करते हैं और न ही आदर्श आचरण करते हैं।

(114) सेवा व्यक्ति की संकुचित वृत्ति को खत्म कर आत्मा व
पवित्र करती है। सेवा दूसरों को सबसे ज्यादा आनंद पहुंचती है
इसलिएर सेवा के प्रभाव से व्यक्ति प्रति ले जाता है। कई बार व
प्रेरित लेकर लोग सकी और दूसरों की सेवा करना आरम्भ का
समाज निर्माण की शुरुआत करते हैं। इस विषय में आचार्य-वचन हैं

अपनी इच्छा से संस्थागत कार्यों को करें।

उदाहरण दे रहा हूं कि हमारे विचार कैसे होने चाहिए। हमारी संस्था में बाह
से व्यक्ति आते हैं। वह ऊपर आएगा तो उसको आते ही सबसे पहले पानी का घः
और वाटर कूलर दिखाई देगा। अब अगर वाटर कूलर के अंदर चिकना-चिकट
दाग लगा हुआ है, मिट्टी लगी हुई है, सफेद, नीला, पीला धब्बा लगा हुआ
अंदर सफाई नहीं है, पानी ठंडा नहीं है, भरा नहीं है, चिकनाई पड़ रही है, निरंत
काई जमते-जमते वह हरा-=काला हो गया है, तो बाहर के लोग उस पानी को न
पियेंगे। वाटर कूलर की स्थिति देखकर उनके मन में दु:ख और द्वेष उपजेगा। ए
आदमी शरबत पिलाने के लिए गिलास लाया। शरबत घोला और चम्मच वहीं ।
रख दी। टूटी के अंदर दातुन फंसी है, वहाँ वैसी की वैसी पड़ी है। यह स्थिति ठी
नहीं है।

आर्थिक को अपनी माताओं और बहनों से ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।

रीजाना माताएँ घड़े को साफ करती हैं। यहाँ पर ये स्थिति न हो कि कहीं घड़े की

सफेदी निकल रही है, तो कहीं कहीं से वो घिस रहा है, तो कहीं उसका रंग उड़ रहा

की को देखो तो उसके नीचे कूड़ा-कचरा जमा है, दाग लगे हैं। कोई सभ्य
दी इस प्रकार से नहीं करता है, इससे उसको घृणा होती है।

में तो उस व्यक्ति को अच्छा मानता हूँ, श्रेष्ठ मानता हूँ जो अपनी इच्छा से
या घंटा दो घंटा लगाकर के काम करे। इससे आत्मतृप्ति मिलती है।मैं निश्चित
हता हैं कि आप अपनी इच्छा से किसी सामाजिक कार्य को कोगे,.
कल्याणकारी कार्य को करेंगे और उपासना में बैठा करेंगे तो आपकी
उपासना का स्तर अवश्य ऊँचा होगा।

बार-बार मैंने कहा है कि सामान्य उत्तरदायित्वों को जो आपने लिया नहीं
और हमने दिया नहीं है, उनको सबसे पहले लें। जैसे कि घंटी लग गई है
और दो मिनट पहले कक्षा में आ गए। अगर अंदर कमरे में कूड़ा-कचरा पड़ा
है, झाड़-झंखाड़ पड़ा है, कोई पत्ते पड़े हैं तो चुपचाप से अपनी पुस्तकें एक
जगह रखी और झाडू लेकर सफाई कर दी। बस, हो गया काम, छुट्टी आपकी ।
ये काम हो गया और आप ऊपर गए तो देखा कि बाल्टी में पानी भरा हुआ
है, उसको नीचे डाल दिया तो ये काम हो गया परोपकार का। आधा घंटा लगा
के बाल्टी की सफाई कर दी।

अपनी इच्छा से कभी आधा घंटा लगाकर के कोई ऊपर पहली मंजिल
का और नीचे का शौचालय साफ करता हो, ऐसा कोई मुझे तो अपनी संस्था
में दिखाई नहीं दिया। कोई चुपके से करता हो तो मुझे पता नहीं। मैं आठ,
दस, पन्द्रह दिन में या महीने में जब कोई किसी का पर्याय (ड्यूटी) लगाऊगा
या उत्सव आएगा या कोई व्यक्ति विशेष आयेंगे या कोई घटना घटेगी या
सि-पन्द्रह दिन में हम कहेंगे कि- हाँ भाई, अब सफाई करो तो सफाई होती
है।
सव के द्वारा रोजाना क्यों नहीं होती है ये सफाई? इसका मतलब है कि
९ सामान्य प्राथमिक शिक्षा प्राप्त नहीं है। धरातल में बैठना नहीं आता है,
॥ होना नहीं आता, चलना नहीं आता है। सब की बात नहीं कर रहा हूँ
और सब स्तर में नहीं कह रहा हूँ लेकिन जितनी पात्रता होनी चाहिए, उतनी
पात्रता सब के अन्दर नहीं है।
जाते हैं वानप्रस्थ