कल के ४६ वें वार्षिकोत्सव पर अर्थात १३ फरवरी १९६१ ई० के दिन यह सब सामग्री संग्रहालय
ये उद्घाटनार्थ एक छोटे से कमरे में फांसी की थालियों में व्यवस्था से फैलाकर रख दी गई । १३ फरवरी
को सायं चार बजे राजस्थान के सुप्रसिद्ध कर्मठ नेता श्री माननीय कुम्भाराम जी आर्य के कर कमलों से
नुछान पूर्वक संग्रहालय का उद्घाटन हुआ।उद्घाटन समारोह में श्री पूज्य जगदेवसिंह, जी सिद्धान्ती तथा
द्रेसर शेरसिंह जी आदि प्रसिद्ध नेताओं के अतिरिक्त अनेक गण-मान्य व्यक्ति विद्यमान थे। यद्यपि उदघाटन
ह समय उपयुक्त सब सामग्री थालियों में फैलाकर एक छोटे से प्रकोष्ठ (कमरे) में काष्टपटलों (तख्तों) पर
रिली गई थी किन्तु सभी समझदार व्यक्ति यह कह रहे थे कि- यद्यपि ये सिके आज थालियों में रखे गए हैं
दिन्तु एक समय आयेगा जबकि ये सिके एक नये ढंग के विशाल संग्रहालय का रूप धारण कर लेंगे। कारण
कि वह कार्य परम तपस्वी कर्मठ नेता श्री आचार्य जी द्वारा आरम्भ जो हुआा है।
हुआ भी ऐसा ही। कुछ ही समय पश्चात् इस संग्रहालय में इतनी सामग्री एकत्र हो गई कि बाध्य होकर
ये भवनों में फैला कर रखना पड़ा। २३ फरवरी १९६३ को संग्रहालय के फैलाव को विस्तृत रूप दिया
ये भवनों के छ: प्रकोष्ठों को सामग्री के विस्तार ने घेर लिया। अब तो सामग्री इतनी एकत्र हो चुकी है
के प्रदर्शन के लिये एक बहुत बड़ा आधुनिकतम संग्रहालय भवन अपेशित है और इस अपेक्षा को
अन्वित करने हेतु हरियाणा सरकार ने १० अगस्त २०१४ को विधिवत् घोषणा कर दी है। इस घोषणा को
अन्वित रूप कब दिया जाता है, यह परीक्षा का विषय है।
पुरातत्व संग्रहालय के निर्माण में सन् १९६५ तक लगभग ७२५०० (साढे बहत्तर हजार) रु0 व्यय हो
का था। इस संग्रहालय में प्राचीन अलभ्य मुद्राओं का तो इतना अद्भुत संग्रह है शायद ही किसी भारतीय
संग्रहालय में है। इस बात को अनेक आगन्तुक पुरातत्त्व वेत्ताओं ने भी स्वयं अपने मुख से कहा और स्वीकार
किया। पाठक महानुभाव इस विचित्र सी दिखने वाली परन्तु सत्य बात पर विश्वास न करें और कह बैठे कि
॥ अपने छाछ को कौन खट्टा बताये।’किन्तु ऐसा समझने वाले सभी सज्जनों से और विशेषकर पुरातत्त्ववेत्ताओं
में निमंत्रण रूप में साग्रह प्रार्थना है कि वे एक बार अवश्य गुरुकुल पधारें और देखें कि इस कथन में सत्यता
है वो नहीं ?
गुरुकुल संग्रहालय का अधिक विस्तार सन् १९६३ से १९७५ ई० के मध्य हुआ। इस बीच अनक
उलपूर्ण उपलब्धियां हुई।९ दिसम्बर १९६३ ई० को श्री मास्टर भरतसिंह जी, बामला के सौजन्य से एक
अनत महत्वपूर्ण ब्राह्मी लेख युक्त मिट्टी की मोहर तथा कार्षापण (पञ्चमाक्र्ड), यौधेय, कुषाण शासक
कनिष्क हुविष्क एवं भारतीय युनानी मुद्राओं के सांचे मिले । माननीय मास्टर जी ने इस संग्रहालय के निर्माण
वहुत अधिक महत्त्वपूर्ण योग दिया है। आपने इस संग्रहालय को जो सामग्री प्रदान की, उसके द्वारा अनेक
कसपूरण किन्तु अभी तक अज्ञात रहस्य सामने आ रहे हैं और आगे भी आयेंगे। इस सामग्री में जड़ होते हुये
वह सामर्थ्य और क्षमता है कि वह स्वयं “मान न मान मैं तेरा मेहमान”उक्ति को चरितार्थ करने में समर्थ
तरिक प्रसिद्ध इतिहासकार और पुरातत्व वेत्ताओं की लेखनी पुरानी काल्पनिक मान्यताओं को बदलने में
हो जायेगी। यह सब श्रेय श्री मास्टर भरत सिंह जी को ही है। इसके लिए सम्पूर्ण ऐतिहासिक