साधक को पकार(sadna ki pukar)

Part2

यह आत्मा अपना स्वरूप खोलता है ।'”
तो
महाराज ! चुनाव
का काम तो स्वयं श्राप ही ने करना है । वेद
के अन्दर तो आप यह कह ही चुके हैं कि जिस किसी को श्राप चाहते हैं,
उसे आप मेधावी, तेजस्वी सब-कुछ बना देते हैं
श्रमेव स्वयं सिद्ध वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषे भी:
य कामये ते तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषि तं सुमेधाम् ।।

ऋ १० । १२५ । ५।।
देवताओं तथा मनुष्यों को मैं स्वयं प्यारा वचन कहता हूँ । जिस
जिससे मैं प्यार करता है, उसको तेजस्वी, विद्वान्, ऋषि प्र मेधावी
बना देता हूँ ।’
तब मैं इधर-उधर क्यों भटकू ? अब तो मैं तेरी ही प्रतीक्षा में बैठा
हूं-

स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव ।
सचस्वा नः स्वास्थ्य । ऋ १ । १ । ९ u
| “हे सुन्दरों से भी सुन्दर ! आओ, हमें दर्शन दो, ताकि हमारा
कल्याण हो । आप हमारे पिता हो और हम आपके पुत्र हैं ।
श्रुधी हवमिन्द्र मा रिषण्यः स्याम ते दावने वसूनाम्
इमा हि त्वामूजों वर्घयन्ति वसूयव: सिन्धवो न क्षरन्तः ॥

ऋ० २ । ११ । १ ॥
“हे प्यारे प्रभो ! मेरी पुकार सुनो। उपेक्षा छोड़ो। हमें (भक्ति में)
धनी बिना । हम तुम्हारी उत्तम भक्ति (के रस को तुम्हारी ओर)
नदियों के समान बहाते हैं ।’
प्र ते नावं न सामने वचनस्य

ब्रह्मणा यामी वनेषु दाधृषिः ।
कुविन्नो अस्य वचसो निबोधि
षदिन्द्रमुत्सं न वसुना सिचामहे ॥
ऋo २। १६ ७॥
“अब हम तेरे भक्तिरस में मस्त होकर तेरी नैया पर चढ़ बैठे हैं।
हमें टेर सुनाने की वह शक्ति दे दे, जिसे तू भी सुने बिना न रह सके

– ऐश्वर्य का स्रोत है, जहाँ से पीते-पीते हम कभी भी न थकेंगे ‘
तिष्ठा स क मध जन्मा परा गावः सोमस्य नु त्वं सुतस्य यक्ति: ।
पितर्न पुत्रः सिचमा रहे त इन्द्र स्वादिष्टया गिरा सचिवः ॥

ऋo ३ । ५३ । २ ।।

| “भो ! छोरो, बैठो, कहाँ जाते हो ? मैं अपने भक्ति रस में कमी
न होने देगा । जैसे पुत्र पिता का पल्ला पकड़ लेता है, वैसे ही मैं तोतली
बोली (बोलता हुआ) तुम्हारी शरण में छाता हूँ।'”
न त्वा बहन्तो अद्रयो वरन्त इन्द्र वीळव ।।
यद् दित्ससि स्तुवते मावते वसु नकिष्टदा मिनाति ते ।

ऋ० ८ । ८८ ॥ ३ ॥

महाराज ! तुम्हारे आगे बड़ी-छोटी कोई रुकावट नहीं हो
सकती। जब तुम अपने भक्तों को निहाल करना चाहते हो तो किसी
की क्या मजाल है कि बीच में खड़ा हो सके !”
उत स्वया तन्वा स वेद तत्कदा न्वन्तर्वरुणे भुवानि
कि मे हष्यमहणानो जुषेत कदा मृतौक सुमना अभि ख्यम् ॥

ऋ ७ । ८६ । २ ॥

मैं अपने अन्दर सोचता हूँ कि कब मैं तुम्हारे अन्दर लीन हो
सकेंगे, तुम कब्र मेरी प्रार्थना को स्वीकार करोगे, कब मेरा मन
इतना अच्छा हो जायेगा कि मैं तुम्हारी कृपा का पात्र बन जाऊंगा ।’
वनीवानो मम दूतास इन्द्रं स्तोमाश्चरन्ति सुमतीरियानाः
हृदिस्पृशो मनसा वच्यमाना अस्मभ्यं चित्रं वृषण र दाः ॥

ऋ १० । ४७ । ७ ॥
‘भक्ति से भरे हुए मेरे गीत प्यारे के पास दूत बनकर जा रहे हैं,
ताकि वे मुझ पर मेहरबान हो जायें। मेरे हृदय की व्यथा बतलानेवाले
गति उस प्यारे इन्द्र के हृदय को उकसा देंगे, तब इन्द्र हमें शक्ति और
भक्ति वाला धन दगे ।”

कद् रुद्राय प्रचेतसे मीह लुट माय तबपसे ।
वोम शांती हुए ॥ ० १ । ४३ । १ ॥