साधक को पकार
तेरे द्वार पर बैठे-बैठे कितना समय बीत गया ! क्या मेरी टेर अभी
सुनी नहीं गई? सुनते चले आ रहे थे कि यदि भक्त एक पग आगे बढ़ाये
तो भगवान दो पग आगे बढ़कर गोदी में ले लेता है। परन्तु यह क्या ?
मैं तो चलते-चलते थक गया। अब तो पाँवों में अधिक चलने की शक्ति
क्या ?
नहीं । इस साधना यात्री के नयनों से बहता नीर भी तुमने नहीं देखा
जगज्जननी ! अपने नन्हे-से बालक का रुदन तो कोई भी माँ सहन
नहीं कर सकती । शिशु का रुदन तो पाषाण-हृदय को भी द्रवित कर
देता है । फिर मेरा रोना-बिलखना क्या माता का ह्रदय पिघला नहीं
सकेगा ? माँ, अब तो रोया भी नहीं जाता आंसू भी सूख गये हैं। तुझे
कैसे बताऊँ कि तेरे दर्शन के बिना मेरी क्या प्रावस्था हो रही है !
सुना था, तू एक-एक हृदय की एक-एक भावना को जानता है।
परन्तु मर हृदय की व्यथा क्या तुम नहीं जान सके ? सब जाननेवाले !
मेरी इस अवस्था को देखकर क्या तुझे दया नहीं पाता ? यह ठीक
है कि तेरे निकट पहुँचने के लिए जिन परीक्षाओं में उत्तीर्ण होना
आवश्यक है, मैं उनमें पूरे नम्बर नहीं ले पाया। यह भी ठीक है, वे तप
और त्याग की भूमियाँ भी मैं प्राप्त नहीं कर सका, जो दर्शन से पूर्व
प्राप्त कर लेनी चाहिए ।
यह भी सत्य है कि यह शरीर इतना दूध प्रशासन लगाने और योग
की सारी क्रियाएँ करने के योग्य भी नहीं । यह भी सत्य है कि मेरा मन
मन्दिर उतना स्वच्छ नहीं जितना तेरे स्वागत के लिए होना चाहिए।
हाँ महाराज ! यह भी ठीक है, अभी सांसारिक वासना भी पीछा
नहीं छोड़तीं । यह मन लाख यत्न करे, फिर भी इतना नटखट बना हुआ
है कि नित्य नये खेलों में उलमा ए रखता है। यह भी ठीक है, इन
इन्द्रियों के घोड़ों को वश में करते-करते मैं हार चुका हूँ । ये कभी इस

(में और कभी उस गढ़े में गिर ही देते हैं । महाराज ! क्या कहूं,
अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
द्वते प्यारे योगेश्वर श्री कृष्ण भगवान द्वारा यह संदेश भेजा था कि-
माघरेब स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥
३ भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय ! प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥

गीता ०६।३०-३१ ॥

वादि महादुराचारी भी अनन्य-भक्त होकर मुझे भजता है, तो
उसको ला ही जानना चाहिए i क्योंकि उसने भला निश्चय किया है।
जल्द ही धर्मात्मा बन जाता है और सदा की शान्ति को प्राप्त होता
पर्जन ! निश्चय जान, मेरा भक्त कभी भी नष्ट नहीं होता ।’
तो तेरी चौखट पर कब से सिर रखे हूँ । तुझे ही पुकार रहा हूँ।।
ब तक मेरी पुकार न सुनोगे ? मैं भी तेरा ही पुत्र हैं। नहीं उठेगा तेरे
पुकारता हैं
दार से, चाहे जो हो । ले प्यारे ! अब तेरी ही पवित्र वाणी द्वारा तुझे

प्रववावतो न आ गहि परावतश्च वृत्रहन् ।
इमा जुषस्व नो गिरः ॥ ऋ० ३।४० ॥ ८ ॥
सुनो, मेरी टेर को सुनो ! पास हो चाहे दूर हो, जहाँ हो, वहीं से

महाराज ! कृपा आज करो या कल, प्राप्त कृपा के बिना मेरे
मन की प्यास बुझ नहीं सकती। यदि मैं वेदपाठी भी बन जाऊँ, योग के
गरे अंगों का अनुष्ठान कर ले, फिर भी तो महाराज की कृपा के बिना
मेरा
उद्धार नहीं हो सकता है । आप ही के ऋषि ने घोषणा की थी कि
ना आत्मा प्रवचनेन लम्यो, न मेधया न बहुना श्रुतेन

वृणुते लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनू स्वाम् ॥
“यह प्रात्मा न वेद से पाया जा सकता है, न मेधा से, न बहुत सुनने
मुण्डक० ३।२ । ३ ॥
से जिसको यह प्राप चुन लेता है, वही इसे पा सकता है,