पिता का तिरस्कार(pta ka teraskar)

part3

पञ्चाङ्ग पान कराया । इस प्रकार वारह वर्ष तक वारह वृक्षों को।
पञ्चाङ्ग पान कराने के पश्चात् मन में पूर्ण स्थिरता आ गई।
साधना का फल :
स्थिरता गाने का परिणाम यह हुआ कि जीवन क्रियात्मक वन
गया । जीवन में तपस्या का पूर्णतम बल आ गया, आत्मा वलवान वन
गया। बलवान बन जाने के कारण नाना प्रकार के परमाणु जो वायुमण्डल
में भ्रमण करते हैं, उनसे बुद्धि मेधावी वन गई । जब पूर्णतया मेधावी वन
गई तो मेधावी से यह हुआ कि नाना प्रकार के लोक-लोकान्तरों में जाना,
यातायात का होना, प्रकृति के सूक्ष्म रूप को जानना, करोड़ों जन्मों के
संस्कार, जो चित्त में थे, उनमें उदबुद्धता आने लगी । उनमें उद्बुद्धता आने
पर वे जो विज्ञान के संस्कार थे वे प्रगति को ग्राने लगे । नाना प्रकार
के यन्त्रों में गति आने लगी । यन्त्रों का निर्माण कैसे होता है ? क्योंकि
बुद्धि और मेधावी क्षेत्र तक ही प्रकृति विज्ञान रहता है, प्रकृति की धारा
रहती है। प्रकृति के स्वरूप का साक्षात्कार हो जाता है। जैसे चन्द्रमा में
कैसे जाना है ? चन्द्रमा की किरणों के साध योगी कैसे ऊर्ध्वगति को प्राप्त
होता है, चन्द्रमा की कान्ति में योगी कैसे के साथ योगी कैसे ऊध्र्वगति को
प्राप्त होता है, चन्द्रमा की क्रान्ति में योगी कैसे मन करता है ? इस
प्रकार की गति, उसमें नाना प्रकार के यौगिक परमाणुओं का मिलान,
नाना प्रकार के मंत्र, वरुणास्त्र, आग्नेयास्त्र, स्वाति आदि नाना
प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण, उनकी प्रक्रिया साक्षात्कार होने लगी।

योगी की चरम गति

मेधावी का क्षेत्र समाप्त होने पर घर भी महान तपस्या में जब
परिणत हुए तो ऋतम्भरा आती है । ऋतम्भरा उसको कहते हैं जव योगी
प्रकृति के ऊपर ग्रपना ग्राधिपत्य कर लेता है । ऋतम्भरा के पश्चात्
| प्रज्ञा में चला जाता है। प्रज्ञा उसे कहते हैं जहां एक ही ब्रह्म-दृष्टिपात
गिरा ता है । ऋतम्भरा में जाते ही मन विभाजनवाद, प्रकृति में रमण
करने लगा, तथा प्रकृति के गर्भ में परिणत होने लगा। प्रज्ञा के क्षेत्र में
जाने पर स्थूल तथा सूक्ष्म दोनों सम्बन्धों का विच्छेद हो करके केवल
एक लिङ्गमय रह जाता है, जिसको कारण कहा जाता है । कारण में
जाने के पश्चात् मन का सम्बन्ध नहीं रहता, तो प्रकृति की तत्वों का
स्मरण शक्ति भी नहीं रहती । उसका भी विच्छेद हो जाता है ।

(अट्ठाईसवें पुष्प ११-११-७२ ई०)

मेरे पूज्यपाद गुरुदेव जी मुझसे यह कहा करते थे कि हे बाल को !
हे ब्रह्मचारी ! तुम याज्ञिक हो। याज्ञिक पुरुष का कल्याण का
अध्ययन नहीं करना चाहिए। पुरातन काल जब ग्रह अध्ययन करते थे तो
लगभग ४०-४० वर्षों तक किसी सुन्दरी का दर्शन भी नहीं होता था, इससे 5
हमारे मन में शुद्ध संस्कार पाते ही नहीं थे केवल अध्ययन का काये चनता
रहता था । जब हम उससे उपराम होते, गृहस्थ में रहते तो अकल्याण के
पठन-पाठन की क्रिया को वे यह कहा करते थे कि उनका अभ्यास न करना
तुम्हारे लिए पुण्यकर है। कल्याण की पोथी का अध्ययन करने से मानव
का कल्याण होता है। वह भी अध्ययन है। जो कुछ अध्ययन है, जो कुछ
धर्म शास्त्रों का, ऋषि मुनियों के जीवन का अध्ययन करता है, उससे मानव
में प्रेरणा प्राती है। वह जो प्रेरणा है, वह मानव के दबे हुए संस्कारों को
उद्बुद्ध कर देती है, उसके पुण्य उदय हो जाते हैं, मानव कृतकृत्य हो जाता
है।

जो अकल्याणकारी अध्ययन है वह कु अध्ययन है, उससे बुद्धि में
वासना की वार्ता आती रहती है। वह वासना मानव के पुण्यों को नष्ट कर
देती है, पापों को एकत्रित करने से उसका आहार भी अशुद्ध हो जाता है,
उसकी प्रवृत्ति भी चंचल हो जाती है। मानव जीवन की जो निश्चिन्तता
है, वह सव समाप्त हो जाती है । अतः ग्रकल्याण का अध्ययन नहीं होना
चाहिए, वह का-अध्ययन है।

सात्विक-विचारों में यज्ञ सफल :

सात्विक-विचारों से यज्ञ विनाशकारी :- जब प्रातः काल होता
तो हमारे आचार्य यज्ञ कराते। यज्ञ में जो मङ्गलार्थ मन्त्र होते उससे ऐसा
प्रतीत होता जैसे देवता यहीं हैं। उसके पश्चात् अध्ययन होता । उस
अध्ययन में सुगठितता होती । यज्ञ में रूचि उस काल में होती है जब मानव
के सात्विक संस्कार होते हैं । यदि सात्विक विचारों से यज्ञ करता भी है,
तो यह यज्ञ तुम्हारे लिए विपरीत होकर के तुम्हारे सुकृतों को नष्ट कर
देता है । यह पुण्य ही नहीं देता, पाप भी प्रदान करता है।