पिता का तिरस्कार(pta ka teraskar)

Part2

जिसको प्राण भी कहते हैं, शरीर की ऐसी गति बना करके, उस शरीर के
आत्मा का उत्थान हो करके, अंतरिक्ष मंडल में जहां सूक्ष्म शरीर वाली
महान् आत्माओं के सत्संग द्वारा, उस शरीर द्वारा तुम्हारी प्रकाशवाणी
मृतमण्डल में पहुंचे । वह काल इतना तुच्छ होगा कि उस काल में कोई
तुम्हें तुच्छ कहेगा, कोई पाखण्डी, कोई महान्, किसी प्रकार से पुकारेगा
तुम्हें यह कर्म भोगना पड़ेगा ।”

श्राप पर सजा :
कि आज वह काल
है, जिसमें हम लाखों वर्षों पूर्व किये कार्य को भोग रहे हैं। तुम्हें जनात हो
गया होगा कि वह आज हमारा किया हुआ कर्म है, एक ऋषि
बालक को दण्ड देकर, मृत्यु को प्राप्त कराके इस अवस्था को पा रहे हैं।
अब तुम प्रश्न करोगे कि महान् आत्मा श्राप नहीं देती। गुरु ब्रह्मा ने श्राप
दिया तो गुरु ब्रह्मा भी पाप के भागी बन गए ।

शंका समाधान :
इसका उत्तर यह है कि मानव का श्राप क्या है ? वह तो कर्मों के
वशीभूत होता है और कर्मों में बंधन है। किसी प्रकार भी वन्ध जाग्रो ।
ऐसा वेदों का वाक्य है। ऐसा हमारे प्राचार्यों का कहना है कि श्राप वह
देता है जिसकी महान् आत्मा होती है, परन्तु वह देता किसको है ?
वह (महान् आत्मा) उसके अन्तःकरण को जान लेता है। किसी अज्ञानी
को श्राप देता है तो उस ज्ञानी का आत्मिक वल सूक्ष्म बन जाता है।

ज्ञानी दोषी को पूर्ण दण्ड देना चाहिए
जो ज्ञानी सब कुछ जानता हुआ जिस कार्य को कर देता है, उसको
अच्छी प्रकार दण्ड देना चाहिए। उसमें कोई हानि नहीं होती क्योंकि वह
तो दण्ड देना है। हमारे गुरुजी ने हमें दण्ड दिया है।

उस समय गुरुजी ने यह भी कहा था कि उस काल में तुम्हें गुरु भी
प्राप्त नहीं होगा । उस समय गुरुजी से निवेदन किया और कहा, “भगवन्!
हमारा कल्याण कैसे होगा ? जब हम सूर्य-मण्डलों को त्यागकर मृतमण्डल
में जन्म पाएंगे और जन्म धारण करके हमें महान् कोई योगाभ्यासी गुरु
प्राप्त न होगा, तो जीवन कैसे बनेगा ?”

उस समय गुरु ने प्रसन्न होकर कहा, “जागो, जब तुम्हारे उस
शरीर की प्रावस्था पचास वर्ष हो जाएगी, उस समय तुम्हें कोई ब्राह्मणी
आत्मा प्राप्त हो जाएगी।’

बेटा ! क्या करें, हमने तो विचारा भी बहुत है परन्तु गुरु बा
अपमान न सह सके। वह उल्टा ही पड़ गया, हमें भोगना पड़ गया ।
समय की प्रबलता है, मानव पर जब कठिन समय भ्राता है तो शाभ कार्य
भी अशुभ बन जाता है। क्या करें संसार की गति को, गुरु का अपमान
कि गुरु को जीत लिया, हम सह न सके और उसको मृत्युदण्ड दे दिया,
उसकी उल्टी रूपरेखा बन गई। लाखों वर्षों का किया हुग्रा कर्म ग्राज
भोगा जा रहा है। यह परमात्मा की कैसी विचित्रता है? जिसमें 0.
ऐसे कर्मों के फल भी मानव को भोगने पड़ते हैं।

(तीसरा पुष्प ९-७-६२ ई०)

पिछले जन्मों में ब्रह्मा के शिष्य के रूप में :
गुरु ब्रह्मा जी ने श्रृंगी जी को लगभग १२ वप तकु ग्रोपधियों का
पान कराया । उसके पश्चात् चार-चार, पांच-पांच व तक पुष्प अौर
लताओं का पान करा कर ब्रह्मचर्य की ऊर्ध्वगति, वृत्ति को और जीवन
ब्रह्मचर्य में परिणत करके उसके पश्चात् दीक्षा दी थी।

। (अठारहवां पुष्प १३-४-७२ ई०)

योगी की तपस्या तथा साधना का स्वरूप :

जब हम अपने पूज्यपाद गुरुदेव के द्वारा विराजमान होते, तो
उन्होंने सबसे प्रथम जाल वृक्ष का पंचांग बनाकर उसका पान कराया।
पान करने पर गुरुदेव से कहा, “भगवान ! यह तो सुंदर प्रतीत नहीं
होता। उस समय गुरुदेव मौन हो गए, उन्होंने कोई उत्तर हमें नहीं
दिया। न देने का परिणाम यह हुआ कि हस भी मौन हो गए । मौन होने
के पश्चात् इस प्रकृति पर, उसका यह परिणाम हुआ कि यह जो नाना
प्रकार की काम की वासना थी, जो मन चंचल रहता था, उसमें स्थिरता
ग्रा गई। जब मन अकृत (पवित्र) तथा (स्थिर) बन गया, तब उसके
पश्चात् एक प्रभु का चिन्तन रह गया तथा प्रभु को अपने में स्वीकार करने
लगे । इसके पश्चात् एक वर्ष तक पीपल का एक वृक्ष तक, वट का एक
वर्ष तक, बेल का एक वर्ष तक, स्वाति का एक वर्ष तक, सुषा