पूज्य पिता का तिरस्कार :

उस समय जब बालक को अभिमान हो गया तो अन्य त्रयों के
समक्ष पहुंचे। सृष्ट मुनि ने कहा, अरे बालक ! या हा तुम्हारी तपस्या
में ? उस समय उसने पिता को पिता न जानकर अभिमान में कहा,
हे पिता ! तूने तपस्या की है। आज जो मैंने भी है, मैंने तीनों लोकों की
विजय कर लिया है, तीनों लोकों का स्वामी बन चुका हूं । बालक की यह
अभिमान छा गया। वह जिन-जिन आदि ऋषियों से मिलता था, वह
उन-उन ऋषियों को अहंकार दायक वाक्य कहता था और उनको टकरा
देता था। वह इतना अधिक तुच्छ बन गया कि उसका सब किया हुआ
बेकार हो गया। अन्त में वहते हुए वह विभांडक ऋषि के पास पहुंच
गया । इसने उन्हें भी अहङ्का दायक वाक्य कहे। उस समय विभाडक
ऋषि ने कहा, “तुम्हारे गुरु कौन हैं ?”

उन्होंने कहा, “मेरे गुरु श्रृंग्यादि हैं। मुझे उनकी शिक्षा है।’

उस समय ऋषि ने कहा, “अरे ! तुम्हारे गुरु तो ‘ब्राह्मण हैं, वे तो
सत्यवादी है, उनसे यह अहंकार माय वाक्य न उच्चारण कर देना । यदि
तुमने यह उच्चारण किया तो, तो हमें प्रतीत होता है जैसे तुम्हें मृत्युदण्ड
प्राप्त हो जाएगा।”

उस समय उस बालक ने कहा, “अरे ! नहीं, क्या उच्चारण
कर रहे हो ? ‘उन पूज्य विभाण्डक ऋषि को वह अपने पदों से ठुकराने
लगा।

अंत में वह स्वयम् उस ब्राह्मण प्रात्मा के सट जा पहुंचा।
उन्होंने प्रश्न किया, “कहो वालक ! तुम्हारी तपस्या में क्या अवता
हुई ?”

अभिमान की प्रचण्डता :

उस समय उस योगी बालक ने कहा, ‘मैंने तीनों लोकों को विचल
कर लिया है अर्थात् अन्तरिक्ष, च्य-लोक, गृत्युतोक शर अपते पुरपद की
प्राप्त कर लिया है। आप तो यही कहते थे कि क्या तपस्या की 5 घायो ।
भगवन् ! मैंने तीनों लोकों को विजय कर लिया है ।’

गुरुजी द्वारा श्राप :
अच्छा, क्या करें बेटा ! पता नहीं किन-किन से काम का जब भोग
आता है तो मानव की बुद्धि उसी प्रकार की हो जाती है । उस बालक की
ऐसी भावना पाकर और योग द्वारा उसके ग्रन्थ:करण को जान करके
कि उसकी मृत्यु निकट आ गई है। उसी के अनुकूल उन्होंने अपने
मुखारविन्द से यह कहा, अरे ! तुच्छ ऋषि के बालक ! तुझे इतना बड़ा
अभिमान ! जा, मृत्यु को प्राप्त हो जाए ।’ उस समय वह मृत्यु को प्राप्त
हो गया ।।

अब बेटा ! तुम यह प्रश्न करोगे कि परमात्मा के नियम के प्रतिकल
मृत्युदण्ड मिल जाता है क्या ? इसका उत्तर यह है कि जब समय ग्रा जाता
है तो समय के गुरुकुल ऐसा वाक्य कहा जाता है।

जब उसको मृत्युदण्ड प्राप्त हो गया तो त्राहिमाम्-त्राहिमाम् मच
गई। ऋषियों में हाहाकार मच गया। अरे ! यह क्या हुआ ? ऋषि का
बालक ऐसा तपस्वी, मृत्यु को प्राप्त हो गया। उस समय गुरुवर्य ब्रह्मा
आचार्य ऋषि-मण्डल को लेकर क्रोध में छाये हुए वहां जा पहुंचे। उन्होंने
कहा
कहा

गुरुजी द्वारा श्राप-
आदि गुरुवर्य आचार्य ब्रह्मा जी द्वारा भविष्यवाणी :

अरे तुच्छ वालक ! तूने एक ऋषि के बालक को नष्ट कर दिया।
जब तुम इतने बुद्धिमान थे तो तुमने उसको यथार्थ शिक्षा क्यों न दी ?
शिक्षा देकर उसको ऊंचे मार्ग पर चलाते । परन्तु तुमने तो उसको मृत्यु
दण्ड दे दिया। आज तुम्हें भी इन कर्मों का फल भोगना होगा। जन्म
जन्मान्तरों की वार्ता तो यह है कि तुम सूक्ष्म शरीर द्वारा, जैसे और भी
लोक हैं, उन सबमें जन्म पाते हुए सतयुग, त्रेता, द्वापर सब ही कालों को
देखो । परन्तु जिस समय कलियुग के लगभग ५२०० वर्ष व्यतीत होंगे उस
समय तुम्हारा एक विज्ञान गृह में जन्म होगा । वह तुच्छ जन्म हो करके
जितनी भी तुम्हारी ज्ञान की निधि है, यह तुम्हारे समक्ष न रहेगी, वह
समाप्त हो जाएगी। शरीर में अज्ञानता आ जाएगी। प्रकृति बहुत ही
तुच्छ बन जाएगी। परन्तु एक महान् अवस्था आ करके जिसको हमारे
योगियों ने समाधि अवस्था कहा है, जिसको वैखरी वाणी भी कहते हैं,