परिवर्तित कर अपना ठीक परिचय न देकर ठहरा । प्रात:काल
जेनेवा की ओर चल पड़ा, जहां पहुंच कर गुप्त भाव से वह
अपने मित्र के घर में रहा, और अपनी माता की समाधि पर
पुष्प चढ़ा कर इंगलैण्ड को चला गया, इसलिए कि वहां कुछ
काल तक उन मित्रों के निकट रहा जो उसके जिलावतनी के
दिनों में उसे बहुत कुछ धीरज देते थे ।
कुछ कालोपरान्त इस वृद्ध अवस्था में वहां से चला
और एक पत्र द्वारा अपनी सम्मति प्रकट करने के अभिप्राय से
स्विट्जरलैंड जा पहुंचा । जिस िन वहां से विदा हुआ, उसके
एक दिन पहले उसने लिखा कि ”गत वर्ष की मूर्ति तथा
नीचता से, जो दुष्ट लीडरों के कारण मेरे देशवासियों ने ग्रहण
की है, मुझे पूरा विश्वास हो गया कि मेरे देशवासियों की
राजनीतिक शिक्षा इस समय पर्यन्त प्रारम्भ भी नहीं हुई है ।
अभी इटली देश को शिक्षा की आवश्यकता है और मेरा यह
विचार मिथ्या निकला कि शिक्षा से आगे निकल कर कुछ
प्रत्यक्ष कर दिखाने का समय आ गया है। उसने पुन: प्रतिज्ञा
की कि शेष जीवन शिक्षा को देने में व्यतीत करूगा । अपने
देशवासियों की कृतघ्नता से उसका चित्त अंश मात्र भी
चलायमान नहीं हुआ था । उसको यह देखकर एक प्रकार का
सन्तोष होता था कि इस पत्र के प्रकाशित करने में उसके ऐसे
ऐसे सहगामी तथा सहायक थे जिन्होंने बड़ी बड़ी यंत्रणाएं पाने
पर भी अपनी प्रतिज्ञा भंग न की थी, और कभी सांसारिक
लोभवश अपनी सम्मति प्रकट करने में असमर्थ न हुए थे ।
वह विचारता था कि ऐसे सत्पुरुषों का लेख जाति का अवश्य
उपकारक होगा तथा जाति राजनीतिक उन्नति करेगी। इन
लोगों के साथ वह एक वर्ष तक इस पत्र को प्रकाशित करता
रहा । उसके चरित्र-लेखकों ने लिखा है कि उसका यह
परिश्रम आश्चर्यजनक फल दिखाता था, क्योंकि इस वर्ष में
वह किसी न किसी रोग से पीड़ित रहा और बड़ी कठिनाइयों
में दिन व्यतीत करता रहा । इसी वर्ष के अन्त में उसने

गह जाने से प्राय ॥ आल्य पर्वत से किया और
इस यात्रा के बीच वह दुनिया के गण से पटाव
सिधारा । ता० १० मार्च सन १८५3२ को यह दुर्घटना हुई
अन्तिम समय में भी उसने अपनी पवित्र जन्मभूमि का मरण
करते हुए प्राण त्यागे 1 जिसने अपना सारा जीवन अपनी
जन्मभूमि की सेवा में व्यतीत किया, वह अंतकाल में कैसे
उस जन्मभूमि का यान भूल सकता था । सत्य है, यदि
मनुष्य जीवन धारण करे तो उसे इसी प्रकार प्रतीत करे ।
व्यावहारिक गौरव, व्यावहारिक पवित्रता, व्यावहारिक वीरता
हो तो ऐसी हो । यदि ऐसे पवित्र महापुरुष समय समय उत्पन
न होते रहे तो देश तथा मनुष्य का उद्धार होना असम्भव हो
जाय । ऐसे ही सत्पुरुषों के जीवन से यह उदाहरण मिलता है
कि मानुषी आत्मा का उद्देश्य उच्चतम श्रेणी को प्राप्त करना
है, और आत्मा की उन्नति, आत्मा की स्वच्छन्दता, आत्मा का
गौरव, मनुष्य के निज परिश्रम पर निर्भर है । यदि मनुष्य एक
उच्चतम आदर्श को अपने सामने रख कर यावज्जीवन उसके
अनेक दृढ़ता तथा शुद्ध अंतःकरण से उसे प्राप्त करने में
प्रयत्न करे तो कुछ संशय नहीं कि वह शीघ्र उस श्रेणी तक
पहुंच जायेगा ।
मेजिनी का जीवन बतलाता है कि यदि दृढता पूर्वक
उद्योग किया जाय तो कोई कठिनाई नहीं जिसका समाधान न
हो सके, कोई ऐसी कठिनाई नहीं जो परिश्रम से सरल न हो
जाय । इसके जीवन से यह भी उदाहरण मिलता है कि जो
लोग शुद्ध अंतःकरण से किसी विशेष विषय में सयत्न रहते
हैं, वे कठिनाइयों से कदापि भय नहीं खाते, प्राणों को हथेली
पर रख कर आचरणीय और करणीय विषयों को पूरा करते हैं।
यदि प्राण की रक्षा करते हैं तो केवल इसलिए कि उस कृत्य
को पूरा कर सकें । यदि अपने शत्रु को पत्र देते हैं तो इसलिए
कि उनके काम में विष्णु न पड़े । यदि दूसरे की भूल को प्रकट