मुन-मन्दिर का देवता(mn mandr ka davta)

part3

वे एक-दो नहीं, अधिक हैं। इनमें से सबसे पहली श्रेणी में उत्ती
होना अत्यन्त आवश्यक है। इस पहली श्रेणी का नाम है, यम। दूस
का है, नियम । ये दोनों बड़ी दुर्गम घाटियाँ हैं। तीसरी श्रेणी
प्रश्न।1 चौथी है, प्राणायाम । पांचवा प्रत्याहार, छठी धारणा, कि
सातवी ध्यान आती है। इन सात के पश्चात् समाधि है। परन्तु ग्राउ
कल साधक भी यही चाहता है और योग के दुकानदार भी कि पहले
श्रेणियों को जाने दो और समाधि में पहुँचा दो। यह व्यवहार शास्त्र
मर्यादा और यथार्थता के सर्वे विपरीत है।
यम’ किसे कहते हैं? योगदर्शन, साधनपाद के तीसरे सूत्र में
इसका उत्तर दिया गया है-

अहिंसा सत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ।

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह—ये पाँच यम हैं। योग
प्रभ-दर्शन) के जो आठ अंग शास्त्र ने बतलाये हैं, इनके अनुष्ठान के
बिना हृदय की गाँठ नहीं खुलती; अज्ञान, अविद्या, रोगादि क्लेश और
बुद्धि का नाश नहीं होता। इनके नाश के विना प्रभु-दर्शन नहीं हो
सकता। इन आठ अंगों में प्रधान अंग ‘यम’ है।
योग-दर्शन ने तो यमों का पहला स्थान प्रात्म-दर्शन के लिए रहखा
है, परन्तु मेरा यह अटल विश्वास है कि आधुनिक संसार के सारे क्लेशों,
दुखों और पत्तियों का अन्त करने का एकमात्र साधन भी ये यम ही
हैं। अमेरिका, रूस, इंग्लैंड, यूरोप और एशिया के दूसरे सारे देशों के
विद्वान् संसार के जिन भय, अशान्ति, भूख और असंतोष को सहस्रों
योजनाएँ बनाकर भी दूर नहीं कर पाये, उन सबका अन्त योग की थह
पहली श्रेणी ही कर सकती है। अब यम के पाँचों अंगों पर दृष्ट
डालिये

अहिंसा
मन, वचन और कर्म के द्वारा गन्दी मनोवृत्तियों के साथ किट
प्राणी को मानसिक या शारीरिक हानि या पीड़ा पहुंचाना हिसाब

सारे प्राणियों के हित के लिए मन, वचन तथा कर्म द्वारा पवित्र मनो
पत्तियों से कार्य करना अहसा है। अहिंसा के अर्थ यह नहीं कि भीरु,
कायर और दुर्बल की तरह अत्याचार सहन करते चले राम्रो । अहिसा
यह भी नहीं है कि धर्म, जाति और देश पर आक्रमण करनेवालों के
आगे हाथ जोड़े जायें । न ही अहिंसा यह है कि यदि अनाचारी, डाकू,
पापी लोग अबलाओं पर अत्याचार कर रहे हों, माताओं को अपमानित
कर रहे हों, धन-सम्पत्ति लूट रहे हों, भयभीत जनता को उनके घरों से
निकालकर स्वयं उनपर अधिकार जमा रहे हों तो हम कायरों की भाति
खड़े देखते रहे। अहिंसा यह भी नहीं है कि कोई पागल अपने शस्त्र से
अपने को और दूसरों को घायल कर रहा हो तो फिर भी उसका शस्त्र
न छीनो । यदि कोई पुरुष ऐसी बातों को अहिंसा कहता है, तो वह
शास्त्र के मर्म को नहीं समझता । हिसा शब्द ‘किसी के प्राण ले लेना
और अहिंसा किसी को न मारना’ ही के अर्थों में नहीं आता।
वास्तव में अहिंसा या हिंसा का सम्बन्ध मनोवृत्ति से है। एक कुशल
और योग्य डॉक्टर रोगी का पेट चीरता है या टांग काट देता है, दांत
उखाड़ देता है, एपेण्डिक्स का ऑपरेशन करता है और ऐसा करते हुए
कुछ रोगियों की मृत्यु भी हो जाती है, तो क्या ऐसे डॉक्टर को आप
हिंसक कहेंगे ? कदापि नहीं । क्योंकि वह यह सारा कार्य सात्विक
वृत्ति से कर रहा है । सच्चा क्षत्रिय जब युद्ध में देशद्रोहियों का हनन
करता है, तो वह हिंसा नहीं करता; अपितु पुण्यलोक का भागी होता
है । वेद ने प्रवेश किया है

ये युध्यन्ते प्रधनेषु सूरा से ये तन त्यज: ।
ये वा सहस्रदक्षिणास्तश्चिदेवापि गच्छेत् ॥

ऋ0 १० । १५४। ३ ।

जो संग्रामों में युद्ध करनेवाले हैं, जो शूरवीरता से शरीर को
‘त्यागने वाले हैं और वे जिन्होंने सहस्रों दक्षिणाएँ दी हैं, तू उनकी गति को
प्राप्त हो !”