मुन-मन्दिर का देवता(mn mandr ka davta)

Part2

भजन में मन लगायें तथा स्त्री-जाति के कल्याण के लिए समय दें ।
६. अथर्ववेद के तीसरे काण्ड के तीस सूक्त में पारिवारिक जीवन
का बहुत सुन्दर चित्र चित्रित किया गया है। हरेक परिवार में इस
सूक्त का पाठ तथा उसके अनुसार आचरण होना चाहिए।
७. सारे परिवार में प्रास्तिकता की लहर चलती रहे । परिवार
का हरेक व्यक्ति परमात्मा का सपना मित्र समझे और नित्यप्रति यह
प्रार्थना करे
| अजरासस्ते सय्ये स्याम ।

पितेव पुत्रान् प्रति नो जुपस्व।
प्रभो ! हम मैत्री में कभी बूढ़े न हो। तेरी मैत्री हमारे साथ कभी
पुरानी न ही, सदा नई बनी रहे । पिता बनकर, हे भगवन् ! हम पुत्रों
को आप प्यार करें ।’
८. नेक कमाई (खेती, पशुपालन, मजदूरी, व्यापार, शिल्प-उद्योग
तया राज्य-प्रबंध) के द्वारा जो धन मिले, उसी से निराह किया जाय।
पाप की कमाई घर में न प्राणी पाए । किसी का स्वत्व दवाकर, रिश्वत
लेकर, खाद्य पदार्थों–अन्न, घी, तेल, औषधियों में मिलावट करके
कमाया हुआ धन पाप का धन है । ऋग्वेद (१।१।३) में यह प्रादेश है
कि, “मनुष्य अग्नि के साथ धन का उपयोग करे, जो दिन-पर-दिन
पुष्टिकारक ही हो, यश से युक्त हो और सबसे बढ़कर वीर पुरुषोंवाला
हो ।” यहाँ ‘अग्नि के साथ’ का प्रयोजन है, धर्म-कार्यों के साथ।
९. नेक कमाई से प्राप्त किया धन पाकर अभिमान न करे। यह
घन आता-जाता रहता है। जितना अधिक धन प्राप्त करे या परिवार
में जो कोई अधिक सेवा और परिश्रम करे, उतना ही अधिक वह नम्र
होता चला जाये। अभिमान न करे। अभिमान सारी सेवा और पुरुषार्थ
पर पानी फेर देता है ।

१०, मनुष्य-समाज की सेवा का कोई-न-कोई काम जारी रहना
चाहिए। अकेले नहीं खाना चाहिए । बांटकर खाना चाहिए। जो कुछ
पाप कमाते हैं, इसपर केवल प्रापका ही अधिकार नहीं । परिवार और
समाज के अतिरिक्त प्राणिमात्र का भी इसपर अधिकार है।

प्रत्येक परिवार में प्रथम तो तीन, अन्यथा एक गाय तो
ही होनी चाहिए। प्रत्येक गृहस्थी के लिए यज्ञ करना आवश्यक है
यज्ञ के लिए घृत तथा दुध । तीन दुधारू गौएँ सदा घर में रहेंगी.
यज्ञ हो सकेंगे । यज्ञों के अतिरिक्त सारे परिवार को शुद्ध घी घ
मक्खन, दही, पनीर आदि नाना पदार्थ मिलते रहेंगे । वेद ने गाय की
मन्त्र देखिये
महिमा वर्णन की है। ऋग्वेद के छठे मण्डल के २८ वे सूक्त का हो
|ययं गावो मेदयथा कृशं चिदश्रीरं चित् कृणुथा सुप्रतीकम् ।
भद्रं गृहं कृणुथ भद्रवाचो बृहद वो वय उच्यते सभा ॥

ऋ० ६।२८।६॥
है गौओ्र ! तुम दुबले को भी हृष्ट-पुष्ट बना देती हो । कुरूप को
भी रूपवा बना देती हो। हे भली वाणियो ! घर को भद्र भला
कल्याण युक्त) बना दो। हमारी सभाओं में तुम्हारी बड़ी शक्ति कही
जाती है ।’
इस बात को सदा सामने रखो कि अन्न का मन पर प्रभाव पड़ता
है। गाय के दूध का भोजन सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। आपके शरीर तथा
मुखमण्डल पर विदेशी क्रीमें मलने से कान्ति तथा तेज नहीं आयेगा;
न ही नकली घी खाने से । केवल गाय का शुद्ध घृत-दूध ही यह गुण
पैदा करेगा। इस प्रकार का जीवन बना लेने से आप अपने-आपको।
मनुष्य-समाज के योग्य बना सकेंगे और साथ ही प्रभु-दर्शन के लिए भी;
सत्य और सुन्दर संकल्प की जो नींव रखी गई थी, उस पर आप ऐसा
मंदिर निर्माण कर लेंगे, जिस मन्दिर में आपकी मनोकामना पूरी है।
सकेगी।मन्दिर तो बना, परन्तु मन्दिर में प्रवेश कौन कर सकेंगे ? प्रभु
दर्शन का अधिकार तो मनुष्य मात्र को है। यहां ऊंच-नीच, रंग और
देश-विदेश का कोई झगड़ा नहीं। यही एक मार्ग और स्थान है, जहाँ
न साम्प्रदायिकता है, न जाति-अभिमान; न प्रदेश और स्वदेश का कोई
भेद है, न वर्ण-आश्रम का । भाषा और प्रान्त का कोई विचार नहीं ।
परन्तु सत्य यह है कि प्रभु केवल उनको ही दर्शन देंगे जिन्होंने अपने
आपको इसका अधिकारी बना लिया होगा।
मेरे अनुभव में यह आरती है कि जनता में प्रभु-दर्शन की पिपासा
है। वह इस प्यास को बुझाने का यत्न करती है। कुछ स्वार्थी लोग
जनता की इस पिपासा का दुरुपयोग करते हैं। ऐसे लोगों ने प्रभु-दर्शन
की दुकान-भी खोल रखी है । जनता वहाँ जाती है और लाभ की जगह
हानि उठाती है। ऐसी दुकानों में गये हुए श्रद्धालुओं को सन्मार्ग नहीं
दिखलाया जाता, अपितु वहाँ स्वार्थ-सिद्ध की जाती है ।
एम० ए० अथवा वेदतीर्थ की श्रेणी में प्रविष्ट होने के लिए जो
विद्यार्थी आते हैं, उनसे पहले यह पूछा जाता है कि उन्होंने पहली
श्रेणियों की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है या नहीं ? उनके प्रमाणपत्र देखे
जाते हैं और पूरी तसल्ली कर लेने के पश्चात् उन्हें उचित श्रेणी में
प्रविष्ट किया जाता है। परन्तु प्रभु-दर्शन को सबसे ऊपर की श्रेणी में
प्रविष्ट होने के लिए कुछ भी नहीं देखा जाता और साधक को आते ही
अनीमा (बस्ती) कराने के पश्चात् प्रभुदर्शन के लिए बिठला दिया जाता
है । इस श्रेणी में बिठलाने से पूर्व जिन श्रेणियों की परीक्षाएँ देनी होती