दरे मुन-मन्दिर का देवता मेरा पति ही है। इसमें और कोई स्थान नहीं
का इतिहास में पतिव्रत-धर्म को आर्य-संस्कृति का विशेष चिह्न
माना गया है और ऐसी देवियों को आदर्श के नाम से पुकारा गया है।
माता सीता, सती सावित्री, पूजनीय अनसूया, सती पद्मिनी तथा ऐसी
उठता है ।
हो पन्य देवियों का नाम जिह्वा पर आते ही चित्त प्रफुल्लित हो
जब भगवान राम के साथ सीता भी वन की ओर चल पड़ीं तो
मार्ग में महर्षि अत्रि का आश्रम आया। महर्षि की पतिव्रता सत्य-परायण
पत्नी अनसूया को जब पता लगा कि सीता अपने पतिव्रत धर्म को
निभाने के लिए कठिन तपस्या करने को तैयार हुई है, तो माता अनसूया
बड़ी प्रसन्न हुई और उन्होंने सीता जी से कहा
नगरस्थो वनस्थो वा शुभो वा यदि वाऽशुभः ।
यासां स्त्रीणां प्रियो भर्ता तासां लोका: महोदय:।

| वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड ११७ । ११ ॥
“स्वामी नगर में रहें या वन में, भले हों या बुरे, जिन स्त्रियों को
वे प्रिय होते हैं, उन्हें महान् अभ्युदयशाली लोकों की प्राप्ति होती है।
सीता जी को क्या यह पहले ही निश्चय न था ? था और पूरा
निश्चय था, इसलिए जब भगवान राम ने वनों-जंगलों के भयंकर दृश्य
खींचकर सीता जी को घर ही में रहने की प्रेरणा की तो सीता जी ने
कितने सुंदर शब्दों में कहा था

प्राणनाथ करुनायतन, सुन्दर सुखद सुजान ।
तुम्ह बिनु रघुकुल-कुमार-विशु, सूरजपुर नरक समान ॥
तनु धनु धामु धरनी पुर राजू ।
पति – बिहीन सब शोक समाजू u
भोग रोग – सम भूषन भाग।
जम जतना सरिस संसारू ॥
प्राननाथ ! तुम्ह बिन जग माहीं ।
मो कहँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं॥

ऐसा प्रदान रखने वाली बेटियां ही सती-साज्ञी कहलाती तथा मान
पाती है।
२. जिन परिवारों में मीठी वाणी का प्रयोग होता है, वहीं अानन्द
की वर्षा होती है। गरीबी में भी प्रसन्नता उनके अगिन में खेलती है।
द्रौपदी के एक कड़वे वचन ने ही महाभारत का युद्ध करा दिया था,
जिसने भारत का ऐसा नाश किया कि आज तक संभल नहीं पाया।
वेद ने आदेश दिया है कि ‘तुम्हारी जिह्वा के अग्रभाग में भी श्र
अन्तिम भाग में भी मधु भरा हो ।”
एक कवि ने ठीक कहा है-“वाणी की मधुरता से बढ़कर कोई
मधुरता नहीं। कड़वी वाणी से कोई उपकार भी करे तो प्यारा नहीं
लगता। कोयल बोलते समय क्या लाकर दे देती है और कौप्रा क्या ले
जाता है ?’
तुलसीदास जी ने भी कहा है
तुलसी मीठे वचन ते, सुख उपजत चहु शोर ।
वशीकरण ये मंत्र है, तजि दे वचन कठोर ॥
३. जहां नारियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं।
जिस कुल में स्त्री से भत्ता प्र भत्ता से स्त्री सदा प्रसन्न रहते हैं, उस
कूल में नृत्य अटल कल्याण बना रडता है।
४. जहाँ प्रतिदिन हवन-यज्ञ, संध्या, अतिथियों का स्वागत और
स्वाध्याय होता है, वहाँ ऐश्वर्य, धन, सम्पत्ति और यश नित्य बड़ता
रहता है।
५. वेद ने स्त्री को पुरुष की दासी नहीं बनाया, अर्धाङ्गिनी बनाया
है । पति-पत्नी दोनों दम्पति कहलाते हैं । वेद में ‘दम’ घर का नाम
है। दम्पती के अ्र्थ-‘धर के दो स्वामी हैं, जैसे पति स्वामी है, वेसे
कूर तथा दुर्व्यवहार की बातें सुनने में आती हैं। स्त्रियों के साथ पशुवत् ।
पत्नी भी स्वामिनी है। आजकल कितने ही स्थानों से देवियों के साथ
व्यवहार होता है । यह अत्याचार आज नहीं तो कल उस कुल का नाश
कर देगा । जिन बेटियों के साथ ऐसा व्यवहार होता हो, उनके लि
यही उचित है कि जगत्पति प्रभु को प्रपन्ना पति समझे और उसी