मानव-शरीर-रचना का यौगिक-विवेचन

विचित्र-शरीर-रचना :
मानव-शरीर की रचना इतनी विचित्र है कि इसमें १-बुद्ध का
मण्डल, र-मन को मण्डल, ३-प्रकृति का मंडल, ४-अन्तरिक्ष मडल,
आत्मा का मण्डल और ६-अन्तःकरण को मण्डल है, आत्मा के
प्रयत्न हैं। इनके कारण यह उन कार्यों को करने लगता है ।
इसको दिए हैं ! उन्हें करना अनिवार्य है। प्रभु ने एक बार नियम
कि इस मार्ग पर चल । उस मार्ग पर प्रभु का कार्य प्रारम् ।
है। इसमें मानव का कार्य करना धर्म है। (दूसरा पुष्प २१-८-६२ ई०)

परमात्मा ने मानव शरीर का निर्माण राष्ट्रीयकरण के आधार पर
किया। इसमें नौ द्वार – दो घाण, दो चक्षु, दो श्रोत, एक वाक
उपस्थ तथा एक गुदा, इन्द्रियां हैं। दसो इन्द्रियों पर शासन करने वाला
दशरथ इस पर शासन करता है। राम, रमेति, परमात्मा इसके कण-कण
में व्याप्त हो रहा है और अयोध्या नगरी को पवित्र बनाता चला जा
रहा है।

नाभि द्वार क्यों नहीं
नाभि के द्वार क्यों न माना जाए ? जबकि इसके द्वारा गर्भ में
बालक परिपक्व रस का पान स्वांग नाम की नाड़ी द्वारा करता है।

इसका उत्तर यह है कि नाभि एक चक्र माना गया है, जो शरीर
का केन्द्र है । पूर्व जन्म के संस्कारों का सम्बन्ध केवल वायु से, अन्तःकरण
और स्त्रियों से होता है, नदियों से नहीं। नाभि नाड़ियों का केन्द्र है।
शरीर में ७२७२१०२०२ (बहत्तर करोड़, बहत्तर लाख, दस हजार)
सौ
दो) नाड़ियां हैं। वे कुछ हजारों में इस नाभि से ही चलती है।
में भी नाभि का सम्बन्ध माता की नाड़ियों से ही होता है । नाडिय
गांव के
समूह से सम्बन्धित होन से यह नाड़ियों का समूह ही माना जाएगा।

प्रश्न : चक्ष, घाण आदि भी तो नाड़ियों के केन्द्र हैं।
उत्तर : जिस समय पिता का वीय बिन्दु माता के गर्भस्थल में जाता
है तो उसका तारतम्य स्वांग, रवञ्चति और पंचम नाम की नाड़ियों
द्वारा माता की लोरियों से सम्बन्धित होता है। सबसे प्रथम नाभि का
निर्माण होता है। उसके पश्चात् नाड़ियों का सम्बन्ध हो जाता है। जिनसे
माता की लोरियां से प्राण संचार होता रहता है । जो अन्न अ्रीर रस
माता की लोरियों में परिपक्व होता है, उनके कण नाड़ियों द्वारा ही वहां
जाते हैं प्यार वाले का शरीर बनता चला जाता है। जब शरीर बनता
है तो नाड़ियों का समूह बनता है । चक्ष, घाण, उपस्थित ग्रादि इन्द्रियां भी
बनती हैं। परन्तु इनके ऊपरी भाग का कोई सम्बन्ध नाड़ी से नहीं होता।
इसी आधार पर नाभि को द्वार नहीं माना जाता क्योंकि नी द्वारों के
ऊपरी भाग का कोई सम्बन्ध नदियों से नहीं होता।

दसवाँ द्वार तो मेधावी और प्रज्ञा बुद्धि प्राप्त होने पर ही खुलता
है जब परमात्मा के दर्शन होते हैं। जो ब्राह्मणों के शरीर में रमण करता
है, शून्य प्रकृति को कम्पायमान बनाता है, उस परमात्मा को रमयति राम
अादि नामों से उच्चारण किया जाता है।

इस शरीर में दसों इन्द्रियों पर शासन करने वाला मन, मन पर
शासन करने वाली बुद्धि, बुद्धि पर शासन करने वाली आंतरिक भावनाएं
हैं। भावनाओं में वह आत्मा विराजमान है जिसमें उस चेतन स्वरूप का
प्रतिबिम्ब भी उसी के साथ-साथ चला आ रहा है। इसी को राम रमयति
आदि शब्दों से उच्चारण करते है । (सातवा पुष्प ७-७-६५ ई०)

शरीर में आत्मा का निवास :
जागृत अवस्था में यह आत्मा नेत्रों में निवास करता है। उसका
स्वरूप बन करके नेत्रों का कार्य बन जाता है। क्योंकि ये नेत्र तभी तक
दृष्टिपात
कर सकते हैं जब तक प्रात्मा
शरीर में है । जो मानव प्रात्मा
का दिग्दर्शन करना चाहता है वह सूर्य की किरणों से अपना दिग्दर्शन
करता है। उससे नेत्रों को ज्योति में दोनों ज्योति प्रादुर्भाव हो करके
ज्योतिष्मान प्राप्त हो जाता है ।

स्वप्नावस्था में परमात्मा का स्वरूप मन के क्षेत्र म होता है। मन
प्रकृति से बना हुआ है। मन का सम्बन्ध बुद्धि, चित्त, अहङ्कार से रहता