प्रश्न यह गाता है कि आत्मा के निकल जाने पर तो यह शरीर
शून्य होकर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है तो फिर उस शरीर का क्या
बनेगा।

इसका उत्तर यह है कि वह पवित्र आत्मा, जिसका सम्बन्ध अन्त
रिक्ष में यौगिक आत्माशों से होता है, प्राण-संकल्प द्वारा अव्याहत गति
वाला होता है। यह संकल्प मन का होता है, जिसे विश्वभान’ मन कहते
है। ‘विश्व भान-मन’ की एक गति नहीं, बल्कि वह सबमें रमण करने वाला
होता है । मन की विश्वभान-गति हो जाने के पश्चात् मन और प्राण,
जिनको ज्ञान गौर प्रयत्न कहते हैं, इतने व्यापक हो जाते हैं कि वे इस
शरीर में भी कार्य करते हैं। प्रात्मा इतना प्रबल गति वाला होता है कि
वह इन प्राणों पर सवार होकर आवागमन करता है। उसी आवागमन के
द्वारा वह ये गीत आत्माओं से सत्सङ्ग बना लेता है। यह सब जानकारी
योगिक क्षेत्र में जाने से ही हो सकती है। (नौवां पुष्प २९-७-६६ ई०)
सिद्ध-योगी :
जो योगी नस-नाड़ियों के चक्र को जानता हुर्रा, ब्रह्मरन्ध्र में ब्रह्म
चर्य की ओ३म’ रूपी धागे के साथ जिनका ब्रह्मचर्य ऊध्र्वगति को प्राप्त
हो जाता है, वह योगी सिद्ध होता है। वह इस संसार में जीवन-मरण से
मुक्त हो जाता है क्योंकि उसके ब्रह्मचर्य तथा उपस्थ इन्द्रियों का तारतम्य
उच्च हो जाता है।
(सत्रहवां पुष्प २५-२-७२ ई०)

जब ब्रह्मचर्य के परमाणुओं की गति ब्रह्मरन्ध्र के निचले स्थान में
रहती है तो उनकी गति ध्रुवा बन जाती है। उससे (वह) पित-यज्ञ करता
है, सुल्तान आदि की उत्पत्ति करता है। जब उन्हीं परमाणुओं की ऊध्र्य-
गति हो जाती है तो वह मानव देवता बन जाता है उसका जीवन दिव्य बन
जाता है। यह संसार उसके लिए खिलवाड़ बन जाता है। वह परमाणरूपी
अग्नि से यज्ञ करता है, यज्ञ करता हुआ परमाणुओं की ऊर्ध्वगति बना रहा
है, वह ब्रह्मरंध्र से ऊध्र्वगति (को) प्राप्त होना प्रारम्भ हो जाता है ।
(सत्ताईसवां पुष्प ३-३-७६ ई०)

७ ध्यान :
(वाह्य इन्द्रियों के प्रयोग विना केवल मन में लाने की क्रिया या
भाव)
(इसमें ध्यान करना, मन तथा ईश्वर पृथक्-पृथक् रहते हैं)

मन और प्राण दोनों की सामूहिकता तथा सहकारिता का नाम ही
ध्यानावस्था है। दधीचि, शाण्डिल्य, ब्रह्मा आदि महर्षियों ने कहा कि यह
मन सबसे शक्तिशाली है। इससे शक्तिशाली केवल प्रेम ही है। प्राण में
मन का मिलान कराने का नाम ही धारणा है ।’ मन और प्राण की
सहकारिता से उसमें चित्रों का प्रकाश आता रहता है । परमात्मा का प्रकाश
ज्यों-ज्यों आता रहता है त्यों-त्यों मानव समाधिस्थ होता रहता है और वह
योगी संसार के प्रपञ्वों तथा मात-तापमानों से उदास न होता रहता है ।

प्राणों का विभाजन दस-प्राणों के रूप में :

मन और प्राण दोनों को सहकारिता में लाना है क्योंकि मन और
प्राण का विभाजन होते ही आत्मा के मण्डल में चित्त का निर्माण हो जाता
है
। यह संसार मन और प्राण का ही विभाजनवाद है। ये सभी मण्डल,
खनिज और खाद्य, रसास्वादन आदि का विभाजन ही मन और प्राण द्वारा
ही होता है। मन और प्राण का विभाजन होते ही प्राणों का विभाजन
प्रारम्भ हो जाता है और रसों का नाना रूपों में परिवर्तन होता रहता है।
जब मन की धारा को प्राण से सहकारिता करके मिलान कर देते हैं तो
दोनों का मिलान हो करके आत्मा ध्यान एवं समाधि में स्थित हो जाता
है
। प्राण (ही) शरीर में १-प्राण, २-अपान, ३-व्यान, ४-उदान, ५-समान,
६-नाग, ७-देवदत्त, ८-धनञ्जय, 6-कृकल और १०-कूर्म दस रूपों में
परिणत होता है ।

जब मन और प्राण को हृदय में सहकारी कर देते हैं तो वहचित्त को
भी अपने में समाहित कर लेता है। तब ब्रह्म और आत्मा दोनों में अन्त
द्वन्द्व नहीं रहता तब ऐसी विशालता अर महत्ता आ जाती है । उसी को
परम प्रकाश तथा आनन्दमय कहा जाता है वह आनन्द समाधिस्थ अवस्था
में ही होता है।

महर्षि याज्ञवल्क्य तथा गुरु ब्रह्मा जी महाराज आदि का कथन है
कि यह जगत् मानव के हृदय में समाहित हो जाता है। क्योंकि यह
संकल्पवान, विभाजन वाद तथा श्रद्धावाद मानव के हृदय से ही उत्पन्न हो
जाता है। यह तभी होता है, जब मन को प्राण से विच्छेद हो जाता है
अर्थात दोनों दो रूपों में परिणत हो जाते हैं। तब यह मन प्राण का विभाजन
करता हुआ संसार की जानकारी करता रहता है । कुटुंब, गुरु, शिष्य,