क. इसके पश्चात मूलाधार में रमण करता है तो आत्मा की रूप
रेखा बहुत सूक्ष्म वन जाती है । सूक्ष्म वन जाने के कारण वहां पहुंचती है,
जिसको रीढ़ कहते हैं। इसको “भूरभुव: निरीक्षणी रूपकम्’ कहते हैं ।
योगियों ने इसकी रूप-रेखा इस प्रकार दी है कि यहां पर प्रकृति का मण्डल
मन का मण्डल, ब्रह्म को मण्डल, इन सब तन्मात्राओं का मणडल हाता है ।

6. इसके पश्चात् आत्मा का सूक्ष्म रूप बन करके यह महान् आत्मा
नीलप होकर परमात्मा के दर्शन कर लेता है ।
जब योगी इतनी जानकारी कर लेता है तो योगी में इतनी महत्ता
आ जाती है कि स्थूल शरीर को, जब इच्छा हुई त्यागा और लोक-लोकांतरों
में प्रात्मा रमण करने लगता है ।

अव प्रश्न यह उठता है कि जब परमात्मा का ज्ञान वाणी का विषय
नहीं है तो उच्चारण कैसे कर दिया ?
इसका उत्तर यह है कि यौगिक क्रियाओं को अनुभव से जान जाता
है। उसका अनुमान लगा सकते हैं। परंतु जब यह आत्मा-परमात्मा में
रमण कर लेता है और आनन्द ही श्राद्ध भोगता है, उस समय उस
आनन्द को उच्चारण नहीं कर सकता । (पांचवां पुष्प ६-८-६२ ई०)
ब्रह्मरन्ध्र में पहुंचकर योगी अव्याहत गति वाला हो जाता है :
जब योगी ब्रह्मरन्ध्र में अपनी गति ले जाता है तो अग्नि का प्राश्रय
लेता है। यहां ‘अग्नि’ नाम भौतिक अग्नि का नहीं है। मानव का अतिरिक
सूर्य वेद ज्ञान रूपी ज्योति है जो प्रकाश देती है। जब मन और प्राण दोनों
एक सूत्र में हो जाते हैं तो यहां रीढ़ के विभाग से दो नाड़ियां चलती हैं,
इनका सम्बन्ध ब्रह्मरन्ध्र से हो जाता है। जिस प्रकार वृत्त (डण्ठल) पर
पुष्प खिल जाता है, उसी प्रकार ब्रह्मरन्ध्र में उन नाड़ियों में से नाना वाहक
नाड़ियां पुष्प को भांति खुल जाती है और उनका सम्बन्ध नाना लोक
लोकान्तरों से हो जाता है 1

उस पुष्पित स्थिति को ज्यों का त्यों रखते हुए जव योगाभ्यास करते
वाला साधक अपने आंतरिक जगत् को दष्टिपात करता है तो नाभि-या
में
एक कुरुतुक’ नाम की स्थली कहलाती है उसमें वह सूर्य और वद्ा
दोनों के सोम (तत्त्व) लेता है। सोम का अभिप्राय है जो चन्द्रमा
से
कान्तियों द्वारा आता है और सूर्य से प्रकाश द्वारा आता है।

पूर्ण योगी तथा मुक्ति
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ब्रह्मर्षि के ऊपरले स्थान में पिपाद’ नामक स्थान है उसमें वहत
सूक्ष्म सा एक घृत’ परमाणु होता है। घृतम’ जो स्थान है उसमें ब्रह्मरन्ध्र
में प्राण शरीर मन के प्रभाव से जब अंतड़ियां गति करना प्रारम्भ करती हैं,
तव पंखुड़ियों के साथ ही वह जो ‘पिपाद’ स्थल है उसमें से परमाणु ग्राने
प्रारम्भ हो जाते हैं ।

मानव की रसना के निचले विभाग में एक स्वभाकृत’ नाम की
नाड़ी है उसका रसना के अग्रभाग से सम्बन्ध होता है। जब रसना के अग्र
भाग मे वह रस आता है तो उसको योगी पान करता है। वही रस
नामांगृतिक’ नाम की नाड़ी से जाना प्रारम्भ हो जाता है। नाभिकेन्द्र या
नाभि चक्र में वह रसना जाना प्रारम्भ हो जाता है। उस रस को अग्नि भी
भस्म नहीं कर सकती। उस मानव का शरीर वज्र के तुल्य हो जाता है।
वह वज्र वन करके अग्नि में स्वादन पान किया करता है।

(सत्त ईसव पुष्प ३-३-७६ ई०)

जब आत्मा ब्रह्म रन्ध्र में जाता है तो मन उसके साथ रहता है।
यहां मन और प्राणों की एक धारा होकर चलती है। उस समय नाना
लोक-लोकान्तरों का ज्ञान, आत्माशों का ज्ञान, आत्माओं का आह्वान
करना, उन्हें समीप लाना, यह सव उस धारा में परिणत हो जाता है। जब
आत्मा ब्रह्मरन्ध्र’ की सुन्दर नदियों को जानने वाला बन जाता है तो उस
समय उसकी अव्याहत गति बन जाती है।
योगी की लोकान्तरों में अव्याहत गति :
ब्रह्मरन्ध्र के निचले विभाग में रीढ़ के जो मनके होते हैं उनकी
ग्रन्थियां खुलती चली जाती हैं, इसको अभाक-चक्र कहते हैं। इस चक्र में
जाकर जव रीढ़ की अन्तिम ग्रन्थि खुल जाता है, स्पष्ट हो जाती है तो उस
समय श्रात्मा में यह शक्ति ग्रह जाती है कि इस शरीर को त्याग करके
लोक-लोकान्तरों में भ्रमण करके पुनः शरीर में आ सकता है। उसी
यौगिक शरीर में आत्माओं का केन्द्र भी हो जाता है। वह ज्ञान और प्रयत्न
के साथ संकल्प करता है तो उससे वह उसी सूक्ष्म शरीर वाले जीवात्मा
के पास पहुंच जाता है। जब भी वह अपने संकल्प शक्ति से यह धारणा
बनाता है कि अमुक सूक्ष्म शरीर वाले जीवात्मा से सम्बन्ध होना चाहिए
तो प्राण के आश्रित होकर ज्ञान और प्रयत्न के सहित वह उनसे सम्बन्ध
कर लेता है। प्राणों की क्रिया और मन के द्वारा यह मानव शरीर जीवित
रहता है और आत्मा इसमें विराजमान रहता है।