जब मानव कमेंट करता हुशार ध्यान में लीन हो जाता है, मग्न
होने के पश्चात् प्रागे समाधि में लय होने लगता है, तो इसकी यह जानने
की इच्छा होती है कि प्रात्मा गौर प्राणों की संधि कैसे होती है ( प्रास्मा

प्राणों को लेकर कैसे चलता है ?

उस जिज्ञासु का हृदय पवित्र होने के नाते आत्मा श्री
एकता हो जाती है। जैसे एक अच्छा घुड़सवार गृपने उद्दण्ड घोड़े पर
आसानी से सवार हो जाता है उसी प्रकार यह आत्मा प्राण रूपी घोडे ।
सवार हो जाता है । यह परमात्मा सवार होकर चलता हुमा मलाघा
जाता है। मूलाधार में वह स्थान होता है, जहां तीनों गंगातओं-इडा, पमलरं
सपना की उत्पत्ति होती है, जिन्हें गंगा यमुना, सरस्वती के
योगियों, ऋषियों ने, जैसे लोमश, व्यास, पतंजलि, पापड़ी नारद, सनत-
कुमार आदि जिन्होंने मन को अच्छी प्रकार जाना है, निर्णय दिया है कि
मूलाधार में छ: ग्रन्थियां खुल जाती हैं। वे नाना प्रकार की होती हैं। इनके
खुल जाने पर प्रकाश ही प्रकाश हो जाता है।

प्रागे चलकर यह प्रात्मा नाभिक में होता है । जिसे ‘प्रकन्द चक्र’
तथा ‘अग्नि चक्र भी कहते हैं । यहां पर लगभग १२ ग्रन्थियां खल जाती
हैं। यहां एक नाड़ी से कई-कई नाड़ियों का सम्बन्ध होता है। नाभिचक्र
को एक कूप के सदृश माना जाता है जहां नाना नाड़ियां आकर स्नान
करती हैं और उसमें से अपना अंश लेकर अपने-अपने स्थानों को नियुक्त
हो जाती हैं। जब इन नाड़ियों का मार्ग खुल जाता है, तो यह आत्मा
निर्मल हो जाता है।
(तीसरा पुष्प ७-४-६२ ई०)

महर्षि लोमश का अनुभव :
योगी परमात्मा के दर्शन तक क्रमशः कैसे गति करता है ?
प्रथम वेदों का स्वाध्याय करके यह जाना कि यह मन इस पायिव शरीर में
#रहता है । इसकी गति कैसे रहती है ? मन की गति को अन्त:करण में
नियुक्त करते हुए इस अन्तःकरण का एक यन्त्र बनाया। इससे ।
२. मूक्षम प्रर ३. कारण शरीर को जाना । जितनी चित-वृक्तियां हैं, इत
सबको एकाग्र करके अन्तःकरण का यन्त्र बन जाता है प्र भन प्न्त:करण
में विराजमान हो जाता है । वह इस शरीर से उत्थान होता हुआ वाणु, ‘
मण्डल म, सूर्य मण्डलों में विचरण किया करता है ।

जब पांचों प्राणों की एक सन्धि बन जाती है तो सन्धि वन करके
१-मूलाधार से इस ग्रात्मा का उत्थान होता है । ग्राम नाभिचक्र में जाता
है । जब यह मूलाधार में जाता है तो आत्मा अपने पाथवता के सम्बन्ध
को धीरे-धीरे त्यागता है। उसके पास अपना प्राण अधिक रहने के कारण।
वायु का वेग अधिक रहता है। उसे पार्थिवता अपनी ओर खींचती है।
परन्तु जब योगी इस पर अधिक परिश्रम करता है, तो चित्त की वृत्तियों
को एकाग्र करके आत्मा प्राणों के सहित आगे चलता है ।।

२. नाभि-चक्र में जाकर उसके समक्ष ऐसी रूपरेखा अाती है,
जिसको जानकर यह आत्मा जान लेता है कि प्रव तू वाय के वेग में जा
रहा है, बड़ा भयानक प्रतीत होता है। नाभि-चक्र के ऊपर वायु का बड़ा
वेग होता है और वह जल के तत्त्व को लिए होता है, उस समय शरीर से
एक विलक्षणता उत्पन्न होती है।

३. आगे हृदय-चक्र आता है। अव हृदय और नाभि-चक्र के मध्य
जो वायु का वेग अधिक था और जल के परमाणु थे, वे शान्त हने लगे ।
हृदय-चक्र में वायु-अग्नि के तत्त्व अधिक लिए होती है। उस समय इस
आत्मा का प्राणों तथा तन्मात्राओं के सहित बहुत हल्का रूप बन जाता है
जो बहुत सूक्ष्म होता है ।

४. सूक्ष्म रूप वनकर जब यह कण्ठ-चक्र में जाता है तो उसके
पश्चात् प्रतीत होता है कि वह ऐसे आंगन में आ गया है जहां वायु का वेग
बहुत ही सूक्ष्म है, आत्मा वहां भ्रमण करने लगता है।
५. आगे चलकर यह आत्मा घ्राण-चक्र में जाता है तो प्रतीत होता है
कि अव तु ऐसे स्थान में ग्रह गया है जहां चन्द्रमा अपनी कान्ति दे रहा है।

वहां ऐसा अनुभव होता है कि वह चन्द्रमा और सूर्य के मध्य में परिक्रमा
कर रहा है।

६. इसके पश्चात योगी का आत्मा त्रिवेणी स्थान में जाता है जहां
ऐसा प्रतीत होता है कि पृथ्वी, चन्द्रमा और सूर्य की सन्धि होने जा रही
है ।

७. अागे जब यह आत्मा ब्रह्मरन्ध्र में जाता है तो यह सब कुछ तुच्छ
बन जाता है और इस आत्मा को महान् प्रकाश मिल जाता है, एक मग्नता
| आ जाती है। वह परमात्मा की महान सृष्टि को जानने वाला वन जाता
है ।