ता । इसीलिए हमें दोनों पर विचार ना चाहिए । हुन आत्मा, मन और
प्राण तीनों को मूलाधार, नाभि, हृदय, कष्ठ, घ्राण, ब्रह्मरन्ध्र म ले नाना
है। हमें उन प्रभावों पर विचार-विनिमय करने वाला बनना चाहिए।
जिनके सम्बन्ध से हमारा दर्शन, मानवता तथा जीवन मन के ऊपर म्थित
होता चला जाए। हम अपने वास्तविक स्वय को ज्ञान नक। हम यह
जानना चाहिए कि हमारे शरीर में कितनी नदियां हैं कितने चक्र है और
कितना रक्त का प्रवाह है? इन सबको जानकर हम अपने को साक्षात्कार
कर लेते हैं तो हमारा योग सिद्ध हो जाता है। अपने को साक्षात्कार साधना।
के द्वारा किया जाता है। साधना तभी होती है, जब अन्न पवित्र होता है

प्रयोग:-=महर्षि वरुण महाराज ने अपने पुत्र गौतम को ऋतु और
सत्य का ज्ञान कराते समय पहले १५ दिन के लिए अन्न का त्याग कराकर
जल का पान कराते रहे तो उससे जीवन म ह्रास आ गया तथा स्मरण
शक्ति समाप्त होने लगी । प्रश्न ग्रहण करने पर पुनः स्मरण शक्ति जागरूक
होने लगी। फिर जल का पान वन्द कराकर अन्न ग्रहण कराया। तो मन
में स्मरण शक्ति तो ज्यों की त्यों रही किन्तु प्राण को गति वीमी हो गई।
फिर शन-शन जल का ग्रहण करने पर प्राणों की गति लौटने लगी।

उन्नति का साधन स्वामित्व विहीन सात्विक अन्न :
निष्कर्ष यह निकला कि संसार में दो ही वस्तु ऋत् और सत् कह
लाई जाती हैं। एक वह जिसके कारण स्मरण-शक्ति जागरूक रहती है
तथा दूसरी वह जिसके द्वारा प्राण शक्ति सुचारु रूप से कार्य करती है,
वाह वह वसुन्धरा के गर्भ में हो, चाहे लोक-लोकान्तरों के गर्भ में हो।
प्रश्न से मानव की स्मरण शक्ति जागरूक रहती है तथा मन की आभा
माती है। स्मरण शक्ति का केन्द्र मन ही है क्योंकि अग्नि अन्तःकरण तथा
मन को भस्म नही कर सकता। अतः योगी आत्मा, मन और अन्तःकरण
का यन्त्र बनाकर सूर्य मंडल में भी जा सकता है। ज्ञान और सत्य ऐसी
आना है जो मानव को निर्मल और निराभिमानी वनाती हैं तथा यौगिक
छेत्र में जाकर धर्मज्ञ बना देती है। हमारे भोजन तथा अन्न पर किसी का
अधिकार नहीं होगा, तभी वह ऊंचा बनेगा। उसी से मस्तिष्क सुन्दर तथा
स्वतंत्र बनता है।

पाप का अन्न वह होता है, जो ऐसे द्रव्य से प्राप्त होता है, जिसको
एकत्रित करने में शंका, लज्जा तथा भय उत्पन्न होते हैं। जव भय के अन्न

को मानव ग्रहण करता है, तो वह मानव के हृदय को भयभीत बना देता
है। यही कारण है कि ऋषि पर्वतों की किरदारों में रह कर शुद्ध तथा
रवामित्व विहीन अन्न को ग्रहण करके दार्शनिक वनते थे ।

(बीसवां पुष्प २८-३-७३ ई०)

६-धारणा :

((प्राण में मन का मिलान कराने का नाम ही धारणा है।) (चक्रों
में आत्मा को रमण करना

यौगिक क्रियाओं के लिए सर्वप्रथम प्राणायाम की आवश्यकता है।
जब यह आत्मा प्राणों सहित कुम्भक, रेचक द्वारा मूलाधार में पहुंचता है
तो वहां प्राणों की प्रगति ऊंची हो जाती है और मानव को प्रतीत होने
लगता है कि हमारा शरीर किन तत्वों का बना है और इस स्थान पर क्या
क्या क्या हो रहा है । आगे बढ़ता हुआ यह आत्मा नाभिचत्र में पहुंचता है,
जो शरीर का केंद्र माना जाता है। यहां प्रतीत होता है कि हमारे शरीर
में यह कितनी महान विचित्रता है । परमात्मा ने इन वस्तुओं को कैसा
बनाया है। आगे बढ़ता हुआ आत्मा ऐसे तत्वों को अनुभव करने लगता है,
जो नेत्रों से दृष्टिगोचर नहीं होते।

योगी की आत्मा दूसरी आत्मा से सम्बन्ध जोड़ सकती है :

| आगे बढ़ता हुआ यह आत्मा हृदय-चक्र, कण्ठ-चक्र, घ्राण-चक्र,
त्रिवेणी-चक्र, ब्रह्मरन्ध्र और शून्य चक्र में जा पहुंचता है। उस समय योगी
को परमात्मा की अनन्त सृष्टि का स्वतः अनुभव हो जाता है। योगी अपने
शरीर की प्रत्येक क्रिया को जानकर, शरीर के तीनों रूपों स्थूल, सूक्ष्म और
कारण को जानने वाला बन जाता है। धारणा, ध्यान, समाधि द्वारा मन
को इतना शान्तिमय कर लेते हैं कि ये तन्मात्राए सव मन में लय हो जाती
है,
मन बुद्धि में लय हो जाता है, बुद्धि अन्तःकरण में लय हो जाती है।
ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के जितने विषय हैं, वे अन्तःकरण में लय
हो
जाते हैं । इन सब का समूह बनाकर यह आत्मा इन सबके ऊपर सवार हो
जाता है और जब इसकी इच्छा हुई घूम गया। इसी प्रकार एक योगी
की आत्मा दूसरे योगी की आत्मा से सम्बन्ध करने आ पहुंचती है किन्त
यह कुछ काल के लिए ही आ सकती है। साधारण कोटि के शरीर में
दूसरी
दूसरी आत्मा कदापि नहीं आ सकती। (तीसरा पुष्प ९-१२-६३