गे तीनों प्रकार की चिकित्सा गरे पह। पपरा ग बली प्राती है।
जितनी चिकित्सा है वह सब प्राणी के अंतर्गत प्रति ह मयोंकि औपधि में
प्राण-शक्ति है। इसलिए वह चिकित्सा भी प्राण के द्वारा उदयुध होती है।
जो प्राण किया को जानता है, उन्हें पढ़ ज जल की और औपधियों की
प्रतिक्रिया है, ये साक्षात् हो जाती है । (सत्ताईस था पुष्प २-५-७० ६०)
प्राण चिकित्सा क्यों :
यह प्राण बहुत शक्तिशाली है। इसलिए हमारे यहां बहुत पुरातन
काल से प्राण की चिकित्सा होती रही है। जहां ऋषि-मुनियों ने यह
विचारा कि जिस प्रौपधि में भी प्राण हैं, वहां प्राकृतिकता में भी प्राण हैं।
इसीलिए प्राण चिकित्सा से उत्तम संसार में कोई चिकित्सा नहीं है । प्रत्थेक
मानव को यह ज्ञान होना चाहिए कि हमारा जो प्राण तत्व है वह कितना
विशाल है।
(सत्ताईसवां पुष्प ४-५-७६ ई०)
योगाभ्यास उसी को कहते हैं, जिसमें मन और प्राण की गति का
समावेश किया जाता है। इसमें मन और प्राणों को मिलान करने को
क्षमता होती है। जब मन और प्राण दोनों सुचारु रूप से एक गति में प्रा
आते हैं, उस समय मानव की गति चञ्चल नहीं हो पाती। प्रश्न है कि
मन इतनी गति वाला है कि उसको कोई संसार का मानव एकत्रित नहीं
कर सकता।
प्राण द्वारा ही मन की एकाग्रता :

इसका उत्तर यह है कि यदि कोई मन को एकाग्र करना चाहता है
तो उसे केवल प्राण के आश्रित ही किया जा सकता है। इसलिए ऋषियों
ने कहा है कि यदि मन क एकाग्र करना है तो इसका समावेश प्राण में
कर दो। विना प्राण में किए इसकी गति कदापि धीमी नहीं होगी।
(सोलहवां पुष्प १७-१०-७१ ई०)
योगी जब अपने प्राणों को एकाग्र मुद्रा में बना लेते हैं तो वे जल
पर ऐसे चले जाते हैं, जैसे यह पार्थिव शरीर वाला पृथ्वी पर चला करता
है। इसी प्रकार योगी अपने शरीर को इतना प्राविष्कारमय बना लेता है ।
मन की जो गति है, वह समुद्र पार जाने वाली है। मन की गति को जानने
समुद्र को पार करने की क्रिया आ जाती है। महावीर हनुमान जी
जी
महाराज ने लंका जाते समय इस क्रिया का प्रयोग किया था।

५-प्रत्याहार :

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(इन्द्रिय-दमन अर्थात् इन्द्रिय के विषय से हटाकर चित्त का
निरोध रसना इन्द्रिय-निग्रह)

जब मानव मन की प्रवृत्तियों को विचारने लगता है तो मानव के
हृदय में मन की तरंग एक-एक धान में नाना प्रकार की तरङ्गित होने
लगती हैं । जब मानव इन तरंगों पर अनुसन्धान करने लगता है तो वे ही
तरङ्ग लोक-लोकान्तर में पहुंचा देती है । (दसवाँ पुष्प ९-११-६८ ई०)

मानव के हृदय और मस्तिष्क उस समय एकाग्र होते हैं, जव मानव
की, संसार की इच्छाएं, सांसारिक वैभव, संसार का नाना प्रकार का अग्रत
(संस्कार) तथा भौतिक उसमें संकुचित हो जाता है। उस समय उसक
हृदय में विशालता प्राणी प्रारंभ हो जाती है। मानव का हृदय उस समय
विशाल होता है, जब उसके विचारों में उदारता, ज्ञान तथा विचार रूप
वृक्ष उत्पन्न हो जाता है। जैसे एक कन्या ब्रह्म नारी की सुघड़ता देखकर
प्रभ के विज्ञान का स्मरण करती है तो यह उसके हृदय की विशालता है
मस्तिष्क में जितने जागरूक तन्तु होते है उनका एक ब्रह्मरन्ध्र नाम का एक
केन्द्र होता है। उस ब्रह्मरन्ध्र में सूक्ष्म-सूक्ष्म नाड़ियां होती हैं उनका सम्बन्ध
लोक-लोकान्तरों से होता है । इस ब्रह्मरन्ध्र को ‘लघु-मस्तिष्क’ या ‘हिरात
मस्तिष्क भी कहते हैं।

एक सार्वभौम सिद्धान्त है कि यदि मानव के मस्तिष्क में लोक
लोकान्तरों के जानने वाले यन्त्र नहीं होंगे तो मानव लोक-लोकान्तरों को
किसी भी समय नहीं जान पाएगा । जब एक भौतिक वैज्ञानिक परमाणु
को जानता हुआ, उसके विज्ञान में प्रविष्ट हो जाता है तो उसके मस्तिष्क
में ऐसे तन्तुओं’ का जन्म हो जाता है जिनका सम्बन्ध लोक-लोकान्तरों से
है।
(चौदहवां पुष्प २-११-७० ई०)

योग-सिद्धि का मूल पवित्र अन्न :
हम विभाजनवाद की क्रिया को जानने के लिए योग्य क्षेत्र में जाते
हैं जहां प्रपन्ना विचारों को सुदृढ़ बना सके तथा हसारे हृदय में शान्ति की
स्थापना हो सके । जहां हम स्थिर हो जाते हैं, उसी का नाम शान्ति है
प्रत्येक मानव ऋषि तथा देवात्मा शान्ति चाहते हैं । गुण से गुणी पृथक