मानव के एक श्वास में घ्राण के द्वारा श्रवण-खरे परमाणग्रों
का
निकास हो जाता है और उतने ही परमाणु हम श्वास द्वारा अपने में धारण
कर लेते हैं।
वाणी की उत्पत्ति का विज्ञान :
मानव के मुख से वाणी शब्दों की रचना करती है। शब्दों की रचना
कण्ठ से लेकर ओष्ठों तक वाणी द्वारा होती है। इस पर विचार करने से
प्रतीत होता है कि नाभि से प्राण तक का तारतम्य होता है। इडा, पिगला,
सूषम्णा नाम की नदियों का सम्बन्ध भी कण्ठ के इन्हीं शब्दों से होता है।
ये नदियां शब्दों की रचना में सहायक होती हैं। शब्दों की रचना, उद्
गार तथा उसके स्वरों का प्रारम्भ नाभि से लेकर मस्तिष्क तक होता है
क्योंकि मस्तिष्क से ही शब्दों का तारतम्य होता है। अधिक गम्भीरता
से विचारने पर लगता है कि वाणी का उद्गार ब्रह्मरन्ध्र की नाना प्रकार
की नस-नाड़ियों से होता है।
बिसवां पुष्प पृ०-६६)
हृदय मस्तिष्क ब्रह्मरन्ध्र
हृदय और मस्तिष्क दोनों को मस्तिष्क माना गया है। महर्षि
सोमकेतु मादी ने इसको नाना प्रकार की अवस्था में माना है। महष
दधीचि के अनुसार संसार में जो ‘निघांगनी है, जिसको हृदय और मस्-ि
तष्क कहा जाता है, ये दो प्रकार के हृदय माने गए हैं। वास्तव में तो हृदय
एक ही होता है किन्तु दो इसलिए स्वीकार किए जाते हैं कि मन के
त्रि-गुणात्मक होने के कारण कुछ रजोगुण, तमोगुण तथा कुछ प्रकृति के
आवरण आ जाने के कारण इसमें कुछ अन्तर्द्वन्द्व आ जाता है, इससे दौन:
में कुछ दूरी हो जाती है। अब इन दोनों की चेतना को हमें जानना हैं,
इन्द्रियों ें चेतना जागरूक होती है। जैसे स्पर्श, श्रोत्र, नेत्र, घ्राण आदि से।
ज्ञान प्राप्त होता है । ज्ञान प्राप्ति के ये साधन हैं, कारण हैं ।

इस सम्बन्ध में ऋषि भारद्वाज ने कहा है कि
नाभि केन्द्र से श्वास का जन्म होता है। नाभि से यह प्राण जब ।

के द्वार पर जाता है तो इसके श्ररबन-खरबों परमाणु वाहर चले जाते हैं ।
इन्हा परमाणुओं को एकत्रित करके एक भौतिक विज्ञान वेत्ता चित्र
लन वाला एक यन्त्र तैयार कर लेता है।

इसीलिए इन प्रमाणों को जानने के पश्चात ऋषि नवीन
रच देते हैं। एक योगी उन। परमाणु शेरों की गणना कर लेता है। एक

म धान के द्वारा कितने परमाणु वायु के, कितने जल के, कितने अन्तरिक्ष
के, कितने अग्नि के तथा कितने पृथ्वी के आ गए हैं इनको जानकर प्रत्येक
परमाणु पर जब योगी संयम कर लेता है तो उसमें यह गति उत्पन्न हो
जाती है कि इन परमाणुओं को, जो निचले हैं, का मिलान करके वह
अपने सूक्ष्म शरीर को प्राप्त होकर स्थूल शरीर को भी धारण कर सकता
है।

चक्षुओं से नाना प्रकार की तरंगे उत्पन्न होती रहती हैं। ये तरङ्ग
उनकी स्वाभाविक चेतना होती हैं, जो मानव के चित्त में विराजमान रहती
है । चित्त से श्रात्मा का विशेष सम्बन्ध होता है। उससे ये तरङ्गे उत्पन्न
होने पर ही संसार का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। इन्हीं तरङ्गो
से दृष्टिपात किया जाता है। इन्हीं से यौगिक परम्परागता को जाना
जाता है। इन्हीं तरंगों से मानव वायुमण्डल में भ्रमण करने की गति को
प्राप्त हो सकता है।

मानव के नेत्रों से जो नाना प्रकार की ज्योति उत्पन्न होती है,
इन्ही से माता का दीर्घ दर्शन किया जाता है। उसको तरङ्गों से सूर्य, चन्द्र
आदि लोकों का दिग्दर्शन कर लेते हैं, मण्डलों का दिखा दर्शन कर लेते हैं,
योगी उन तरङ्गों को अपने हृदय तथा मस्तिष्क में ज्यों का त्यों स्थित कर
लेता है। उनमें शनैः शनैः अभ्यासी बन कर उन तरंगों को जान लेता
है। ऐसा होने पर उस महापुरुष में लोक-लोकान्तरों को जानने की गति
उत्पन्न हो जाती है।

प्रत्येक इन्द्रिय से एक ही नहीं नाना प्रकार की चेतना उत्पन्न हुआ
करती है। नेत्रों में २४ प्रकार की तरंगों का प्रादुर्भाव है।

श्रोत्रेन्द्रिय में एक यन्त्र बना हुआ है जिसको सूर्यनित’ नाम का
यन्त्र कहते हैं। इसी को ‘शब्दावली-यन्त्र’, ‘सौधनी-यन्त्र’, ‘मीनकेतु-यन्त्र,
‘मीनकेतु-यन्त्र’, ‘सुवागनी-यन्त्र तथा अंतराग्नि-यन्त्र’ भी कहते हैं। यह
अत्र एक क्षण में साठ लाख तरड़ों को सहन कर सकता है। जव इससे
रधिक तरंगों का जन्म होने लगता है तो मानव कहता है कि अब मैं तुम्हारे
को ग्रहण नहीं कर सकता । क्योंकि मेरी श्रोत्रेन्द्रियों में इतनी शक्ति
ही रही। इससे सिद्ध होता है कि प्रभ के द्वारा बनाए गए प्रकृति यन्त्र
की भी कोई सीमा है।