केन्द्रित करने वाली जो शक्ति है उसी को प्रभ कहते हैं ।

(नौवां पुष्प २-३-६८ ई० )

नाभि में मत।
मानव शरीर की नाभि में लगभग दो करोड़ नाड़ियों का समूह है।
यह नदियों के मध्य में एक स्थान होता है। एक गुपुम्णा नाम की नाड़ी
६ मस्तिष्क से चलती है, उसका सम्बन्ध नाभि-चक्र के अग्रभाग से होता है।
हर जो मनुष्य अच्छे विचारों वाला परमात्मा का चिंतन करने वाला अौर
नाही-विज्ञान को जानने वाला होता है, वह अपनी क्रियाओं में नाडी-विज्ञान
मे, नाना औषधियों से उस नाड़ी के विज्ञान को जानता है।

जिसको सुधित या बोधित नाम की नाड़ी कहते हैं जो ‘ब्रह्मरन्ध्र से
चलती है और जिसका सम्बन्ध नाभि से रहता है। जब चन्द्रमा सम्पूर्ण
कलाओं में पूर्णिमा के दिन परिपक्व होता है तो सुधित नाम की नाड़ी का
सम्बन्ध मस्तिष्क और नाभि चक्र से होता हुआ चन्द्रमा से होता है। चन्द्रमा
ने जो कान्ति मिलती है उसे वह नदी पार करती है। जो विज्ञान के
जानन बाल होते हैं वे जानते हैं कि योग के द्वारा परमात्मा का चिन्तन
करते हुए चन्द्रमा में अमृत मिलता है। वह अमृत पकता है और नाभि में
जो स्थान नदियों के मध्य में है, उसमें यह अमृत एकत्रित होता है। इस
अमृत से मानव का जीवन बलिष्ठ होता है, निभ्रन्ति होता है और मृत्यु
से भी कुछ विजयी बन जाता है। उसे यह ज्ञान हो जाता है कि तेरी मृत्यु
अधिक समय में आएगी। उसकी आयु अधिक हो जाती है क्योकि वह
आनन्दमय अमृत नाभि में होता है। (पांचवी पुष्प २३-१०-६४ ई०)
शब्दोच्चारण :
अंतरिक्ष में शब्दों को पकड़ने के लिए नाभि में चुम्मा’ नाम
का तन्त्र होता है 1 वह मन्त्र अन्तरिक्ष से शब्दों को लेता। उसी ।
कारबन मन के द्वारा उदर में नाभि चक्र में जाती है । नाभि केन्द्र |
गाव श हर वाणी पाता।नत नाही से उस।
हद पगार होता है। (ग्यारहवा पुरुष क-५-६८ ई०)

मानव के शरीर में एक ता पन्त लगा है कि सतव के शब्द, चहे
। पर आसी पानगस्ति । विचार प्रात

है तो उस शब्द की रचना वह स्वतः ही क्षण समय में कर देता है। अर्थात् ।
वायुमण्डल के, उसी तत्व से उत परमाणुओं को, उन अक्षरों को लाकर,
रचना करके शब्दों का उच्चारण प्रारम्भ करने लगता है।

इसलिए जो मानव जैसे शब्दों का उच्चारण करता है, वैसे ही
अंतरिक्ष से उसके समक्ष आने आरम्भ हो जाते हैं। क्योंकि उसके शब्दों
की रचना अन्तरिक्ष में चली गई और वही रचना मानव के मस्तिष्क में
है।
उस विशेष यन्त्र के द्वारा आने लगी है। यही भौतिक विज्ञान में प्रतिध्वनि
(ग्यारहवां पुष्प १-८-६८ ई०)

ब्रह्मरन्ध्र में ‘सौभागकृत’ नाम की नाड़ी का मुख सार होता है।
वह द्युलोक से शब्दों को लाती है। मानव मस्तिष्क में नाड़ियों के द्वारा
वही वाणी की रचना बाह्य रूप धारण कर लेती है ।

शब्द रचना-कम :

मानव की वाणी का सम्बन्ध युलोक से होता है । द्यलोक का सम्बंध
मानव के चित्र से होता है। चित्त का सम्बन्ध अहंकार से और अहङ्कार
का संबंध बुद्धि से होता है। बुद्धि का मन से और मन का सम्बन्ध वाणी
से होकर वाक्य रूप धारण कर लेता है और वार्ता आरम्भ होने लगती
है। चित्त में जैसे संस्कार होते हैं, उसी के अनुसार शब्दों की रचना द्युलोक
से इस मानव शरीर में होने लगती है। (बाईसवां पुष्प पृ०-८०)

हमारी जिह्वा के अग्र भाग में १८२ दाने तथा छिद्र होते हैं। इन
छिद्रों में से कुछ ऐसे होते हैं जिनका सम्बन्ध चन्द्रमा से होता है। कुछ का
सम्बन्ध जगत में विचरण करने वाली औषधियों से होता है, कुछ का
सम्बन्ध नाना प्रकार के रस आस्वादनों से होता है । इन छिद्रों को जानने
की विधि यह है कि तालियों के अग्रभाग का मिलान करते हैं तो हृदय रूपी
से कि ग्रानन्द का स्रोत उत्पन्न होने लगता है। वह स्रोत हमें ऐसा
प्रतीत होता है जैसे हमारा यह शरीर ही जड़ता को प्राप्त हो रहा है। कहीं
ही हम अपने को चेतना अनुभव करने लगते हैं, किन्तु वे साधक लोग
कर सकते हैं जो आध्यात्मिक मार्ग पर जाने फो अरासर हो। उन
को प्रकट करना सहज हो जाता है, जो श्रवण या पठन द्वारा जाने
जाते हैं किन्तु जो स्वयं का प्रनुभव है उनका वाक्यों में प्रकट करना एक
कठिन कार्य है।
(पठार का पुष्प १७-१-७०