औषधियां, इसका पात बना करके, उनकी अग्नि में भस्म बना करके और
मधु के द्वारा पान करने से उतनी ही गति बलवती हो जाती है। परन्तु
साथ में संयम, ब्रह्मचर्य की आभा से और उसको पान करने से हृदय में
पानी से गति प्रविष्ट हो जाती है ।
(चौबीसवां पुष्प १८=८-७२ ई०)।
१-हृदय-गति मन्द क्यों ?
हृदय-गति उस काल में मन्द होती है जब उसकी बाह्य-भावना
अधिक बलवती हो जाती है। बाह्य कामना अधिक बलवती हो गई और
कामना की पूर्ति नहीं होती तो वहाँ क्रोध और मोह दोनों एक गृह में श्रा
जाते हैं। एक गह में आ करके वे मन के एक स्थल में आ जाते हैं। अब
मन, जो संसार में इस शरीर में विभाजन करता था, वह प्राण का विभा
जन करता था, उसका प्राण से मिलन नहीं होता। प्राण से मिलन न होने
का परिणाम यह होता है कि मानव के हृदय की गति मन्द हो जाती है।

इस मन्द हई गति को पुन: चेतना में लाने के लिए हमें उस वस्तु का
पान करना है, जिससे वह क्रोध और ममता, जिसको मोह कहते हैं, वे
दोनों पृथक्-पृथक् हो जाएं।
१-रस की औषधि प्रथम तो ईश्वर चिन्तन है । जब प्रभु का चिन्तन
आ जाता है तो सूर्य के उदय होने पर रात्रि नष्ट हो जाती है, चन्द्रमा
भी शून्यवादी बन जाता है, न चन्द्रमा भासता है, न अन्धकार रहता है,
इसी प्रकार जब मन और प्राण दोनों की सहकारिता में प्रभु को अपना
आश्रय बना लोगे तो अहंकार, अभिमान, क्रोध पृथक्-पृथक् हो कर के
मानव के हृदय की गति स्वस्थ बन जाती है। हमारे शरीर में जो पात बना
हुआ है, जिसको ब्रह्मचर्य कहते हैं उससे ब्रह्म रूपी औषधि को चरते हैं,
सर्वप्रथम इसको चरना है।

भौतिक औषधियों की उपयोगिता :
यदि इन औषधियों को नहीं ले सकते और भौतिक औषधियों का
पान करना है तो हमें उन औपधियों को लाना होगा जिनसे प्राण की गति
तीव्र हो जाए और मन की गति धीमी बन जाए । मन की गति धीमी बन |

करके प्राण के द्वारा मिलान करने लगे तो हृदय में पुनः गति
| जाएगी। जिसके हृदय की गति मंद हो जाती है, उसमें चञ्चलता ।
हो जाती है। वह किसी की वाणी को सहन नहीं कर सकता । कटुता के

प्रतिभा उसमें ग्रा जाती है । वह कुत्ता की प्राभा नहीं मानी चाहिए । इस
| कोटा के प्रेम में उत्तर प्राप्त होता है, त हृदय की गति और मन्द
होने की सम्भावना रहती है। इसलिए संसार में वह गति नहीं होनी

चाहिए ।
मन्द गति क्यों

हृदय की मन्द गति का जो प्रारम्भ होता है वह उस काल में होता
है जब मानव का मन शांत होता है। मन की अशान्ति में मानव शरीर
का आधार, जो शरीर में शासन करने वाला ब्रह्मचर्य है वह नष्ट हो जाता
है। ब्रह्मचर्य के नष्ट हो जाने पर, धातु के चले जाने पर मन में निराशा
उत्पन्न हो जाती है, ह्रास छा जाता है तो मन प्राण से मिलन नहीं कर
पाता है। इसलिए हृदय की गति प्रायः मन्द हो जाती है । मन में जो गति
है, यह ममता है, वह ज्यों की त्यों बनी हुई है।

इसलिए जिनको हृदय की गति को उर्वी बनाना है और मन्दता
को समाप्त करना है, उन्हें अधिक से प्रधान मौन रहना चाहिए । वाणी से
मौन रहना चाहिए, आत्मा का चिन्तन होना चाहिए। उन्हें एकान्त में
अपने कार्य को सुचारू रूप से करना चाहिए। ऐसे मानव का हृदय सदैव
गतिमान वन करके ऊध्र्वगति को प्राप्त हो जाता है।

उन्हें अधिक से अधिक औषधियों का पान करना है, तो उन्हें संयम
का सेवन करना चाहिए । (औषधियों में) १-वटवृक्ष, २-पीपल वृक्ष, ३-शमी
वृक्ष, ४-स्वाति वृक्ष, ५-बेलान्तरी वृक्ष, ६-बेल पत्र (विल्व-पत्र) हैं। इनके
पटचाङ्गों
का पान करना
चाहिए।
पठचाङ्गों में वृक्ष की पांचों वस्तुओं को ले लेना चाहिए । उनको
एक सन्तुलन करके अग्नि में तपा करके, उनका पात बना करके एकत्रित
कर लेना चाहिए ।

जब सूर्योदय होता है तो जैसे एक स्वाति धातु है जिसमें सूर्य की
करणं ग्रा करके प्रतिबिम्बित बन जाती है उस धातु में अनेक रंगों की
नक कारण होती हैं। उन्ही किरणों से हमारे शरीर में, जिस तत्व की
नीता से हृदय की गति मन्द हो गई है; जैसे पित्त प्रधान है, वायु प्रधान
पा प्रधान है; इन तीनों में से कोई भी प्रधानता को प्राप्त हो गया
हो, तो वह मन को सुचारू रूप से कार्य न करने पर हुआ है ।