उत्तर :-इसका उत्तर यह है कि यद्यपि प्रकृति को पूर्ण माना जाता
है । परन्तु जो वस्तु प्रकृति और चेतन के मिलान से बनती है वह सदैव
पथरी रहती है । इन्द्रियां प्रकृति से बनी है। आत्मा का सम्बन्ध प्रकृति
से
है। प्रकृति से बनी इन्द्रियां तथा चेतन आत्मा का मिलान होने पर
अघरी होने की स्थिति में कार्य करने लगती हैं। यदि कोई जिज्ञासु प्रकृति
पर शासन करना चाहता है तो वह प्राथमिक विज्ञान से ही कर सकता है।

। जीवात्मा प्रकृति के ऊपर जाने का प्रयत्न करता है तो आत्मा
प्रकृति पर शासन करने लगता है, इन्द्रियां शान्त होने ललती हैं। उस
समय इन्द्रियों को मन से मिलान हो करके, मन का बुद्धि से मिलान हो
जाता है । बुद्धि से मिलान होने पर मल, विक्षेप और आवरण का अन्ध
कार समाप्त हो जाता है। ऋतम्भरा बुद्धि प्राप्त होकर यह सब कुछ संज्ञा
उस आत्मा में रमण कर जाती है। आत्मा का सम्बन्ध परमात्मा से हो
जाता है। इसी का नाम विस्तार वाला विज्ञान या आत्मिक विज्ञान है ।
विश्राम :
कार्य करते हुए कोई मानव थकित होकर रात्रि में विश्राम करके
पुनः अपनी शक्ति को प्राप्त कर लेता है। यह शक्ति उसको परमात्मा
और रेणुका (रात्रि) की गोद में जाने से प्राप्त होती है। यदि इस विज्ञान
को जान लिया जाए कि यह सब कैसे होता है, तो वह मानव दार्शनिक
बन जाता है, मनोवैज्ञानिक बन जाता है, मन पर शासन करने वाला वन
कर आत्मा के विज्ञान क जानने वाला बन जाता है ।

(चौथा पुष्प १८-४-६४ ई०)

रोग-ग्रस्त होने पर चिकित्सा
योग-चिकित्सा :

शरीर में किसी भी प्रकार का रोग हो जाता है, तो उसे योग के
हारा दूर किया जा सकता है

जब मानव के जिस भी भाग में मन और प्राण शुद्ध रूप से कार्य न
करते, तभी मानव का रंग-भंग होने लगता है। उसी स्थान में प्राण
अच्छी प्रकार संचालित करते हैं । यदि मानव का हृदय दु:खित है, उसमें
रुण ग्रह गई है, तो उसमें प्राण की क्षमता होनी चाहिए । तथा प्राण
का संचार कर देना चाहिए। मानव के प्रत्येक भाग (अङ्ग)

और प्राण दोनों की प्रक्रिया का कार्य होता है तथा प्रात्मा उसमें चेतनित
रहता है।
यदि कोई मानव स्वस्थ रहना चाहता है, तथा अपने शरीर को
उन्नत बनाना चाहता है, तो उसे योग के मार्ग को अपना लेना चाहिए
जिस मार्ग को अपनाने से महापुरुष महत्ता को प्राप्त होते हैं ।

(सदहा पुष्प-१७-१२-६९ ई०)
(विशेष :-योग भाग १ में प्राणायाम का प्रकरण भी देखें ।)

औषधियों द्वारा चिकित्सा

१ हृदय-रोग :
हमारे भुज में अनीता’ नाम की नाड़ी होती है । जिसको अंङ्ग
लाकृति’ कहते हैं । उससे सूक्ष्म अणिमा है। उसमें एक नाड़ी होती है ।
जिसका सम्वन्ध हृदय से होता है। यदि किसी व्यक्ति का हृदय सूक्ष्म हो
और वह प्रबल करना चाहता है, तो उसे नाना प्रकार की शीतल औषधियां
जसे १- चन्दन, २- अग्रति, ३- कापरूणी, ४- छष्टी, ५- जायफल,
६- जावित्री प्रादि का मिश्रण बनाकर एक पहर तक जल में भगा कर
इस पूर्णिमा नाड़ी पर प्रतिदिन अग्रित करना चाहिए। इससे उसका
हृदय एगा।
(ग्यारहवां पुष्प-३०-३-६८ ई०)

जिन व्यक्तियों का हृदय शान्त हो जाता है अथवा हृदय गति
करता हुआ शान्त हो जाता है तो गुरु ब्रह्मा जी ने उनके लिए कहा था कि
। १- अप्रीहि, २- भूषणरिन, ३- क्रान्ति, ४- अवश्वी, ५- सोमभू, ६ आप्राति,
७- वालछड़, ८- सोमकेतु इत्यादि औषधियों का लेपन शरीर पर करना
चाहिए। ३६ दिन तक लेपन करने से ४० वर्ष के व्यक्ति के हृदय की गति
उसी प्रावस्था प्रा जाती है, जो बाल्यावस्था में थी।

(सोलहवां पुष्प-१७-१०-६१ ई०)

यदि किसी मानव के हृदय की गति होते-होते मन्द हो जाए अथवा
वीमी पड़ जाए, तो यहां ऋषि जन यह कह रहे हैं, आयुर्वेद यह कहता है,
धन्वन्तरि जी और विष्णु जी यह कहते हैं कि :
“स्वाति ब्रह्म ह, स्वाति भृतिः, अस्वाति लोकम, ब्रह्म व्यापक प्रवे।”
१-शैलखण्डा स्वाति, जो पर्वतों में प्राप्त होती है, आज भी उसका
* इसी प्रकार है, २.ब्रह्मकेतु, ३-ब्रह्माणी, ४-शंखपुष्पी