हम परमात्मा की उपासना करते हुए, अन्नों को पान करते हुए चले
जाएं, जिससे हमारा जीवन अग्निमय ज्योतिमय बनता हुआ इस संसार
सागर से पार हो जाए ।
(चौदहवाँ पुष्प-१३-८-७० ई.)

| ८-संकल्प-शक्ति :
यह मन हमारे आहार-व्यवहार से उत्पन्न होता है। आहार-व्यवहार
हमारे सङ्कल्प से प्राप्त होते हैं । यह संसार कल्पवृक्ष है। यहां प्रात्मा जो
भी कल्पना करेगा, वही बनेगा, जो (वस्तु) चाहेगा वही वस्तु प्राप्त हो
जाएगी ।

परन्तु संकल्प यथार्थ होना चाहिए। इसमें विवेक होना चाहिए,
जिससे मानव का जीवन पवित्र हो जाए। संकल्प वह पदार्थ है, जिसको
धारण करके लोक-लोकान्तरो में भ्रमण कर सकते हैं । ऊची सङ्कल्प शक्ति
से मानव के रोग भी शान्त हो जाते हैं । यह सर्वोत्तम औषधि है ।।
संकल्प को सोम रस भी कहते हैं। सोम नाम परमात्मा का तथा
रस नाम जान का
है। सोम रसपान करने का तात्पर्य है, परमात्मा से
मिलान करने वाली विद्या का दान करना। इसका पान संकल्प मात्र से
करते हैं।
हमारा संकल्प वास्तविक होना चाहिए। संकल्प से ऊचे चलते
चलते हम परमात्मा से मिलान कर लेते हैं। संकल्प के साथ परिश्रम तथा
विवेक भी होना चाहिए। यदि पुरुषार्थ और संकल्प मन, वचन तथा कर्म
से हृदय में होता है, तो वह ऊंचे शिखर पर पहुंच जाता है ।
विकल्प वह है, जिसका कोई आदि और अंत नहीं होता । जैसे
मानव इस संसार में श्री प्रकार के सम्बन्ध तथा रिश्ते बना लेता है
ये सम्बन्ध माता के गर्भ में आने से पहले नहीं थे और न इस शरीर त्याग
के पश्चात् रहेंगे ।
विकल्प जीवन में अभिमान को जन्म देते हैं। संकल्प नाम परमात्मा
तथा विकल्प नाम प्रकृति का है। दोनों का मिलान होने से संसार रच
गया । जब संकल्प-विकल्प का मिलान हो जाता है तो हमारे हृदय में एक
शक्ति उत्पन्न हो जाती है, जिसको मन कहते हैं।
विचार :
जिस प्रकार वट वृक्ष के बीज में सूक्ष्म सा अंकुर होता है, इसी
मानव के शरीर में सूक्ष्म सा अन्तःकरण होता है। जब बुद्धि और चित्त

संगत और मिलान होता है, तो विचारों की उत्पत्ति होती रहती है।

३५

(नौवां पुष्प-७-६-६७ ई०)
जिस प्रकार सूर्य की रश्मियां विभिन्न प्रकार के तत्वों पर गिर कर
उनके गुणों के अनुसार कार्य करती हुई, सूर्य का प्रतिबिम्ब कहलाती हैं.
इसी प्रकार इस आत्मा से शुद्ध विचारों की रश्मियां चलती हैं। प्रकृति से
वने इस शरीर का यह आत्मा स्थिर कर रहा है । श्रात्मा का सम्बन्ध
परमात्मा से है । जब चेतन अात्मा से नेत्रों के द्वार से प्रकाश चला, तो
आगे बुद्धि आई। बुद्धि का मिलान मन से हुआ, मन का सम्बन्ध हमारे
विचार रूपी प्रकाश से होकर इसी प्रकार का प्रतिबिम्ब बना और इस
संसार में कार्य करने लगे इसको हम विचार कहते हैं।

इसको इस प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है कि आत्मा से चली
रश्मियां मन, बुद्धि पर छाए मल, विक्षेप और आवरण से होती हुई मुखार
बिंद पर आकर उनका विस्तार हो जाता है। विस्तार होकर शब्दों का
कार्य करता है और तदनुसार शब्दों का उच्चारण होने लगता है। जैसे
हमारी इन्द्रियों में नाना प्रकार का अभिमान है, तथा नेत्र दूषित हैं, तो
किसी पुरुष को कुद ष्टि से देखते हैं, मुख दूषित होने पर अशुद्ध उच्चारण
करते हैं, किसी को भुजाओं से दण्ड देते हैं ।

संक्षेप में आत्मा से रश्मियां चल; मल, विक्षेप और आचरण से
मिलान करती हुई, वे मुख पर आकर विस्तीर्ण हो गई।
इन्द्रियों में सत्ता प्रदान होकर, तदनुसार ही कार्य प्रारम्भ हो जाता
है। इसी का नाम प्राथमिक ज्ञान है

मन और बुद्धि में जैसे विचारों की श्रृंखला होती है, चेतन आत्मा
से सम्बन्ध होकर, वैसा ही इसका प्रतिबिम्ब आया, इन्द्रियां तदनुसार ही
कार्य करने लगती हैं। सारांश यह है कि इस बुद्धि में जैसी श्रृंखला, वैसे
ही मन में विचार और जैसे मन में विचार, वैसे ही इन्द्रियों का कर्म हो
जाता है।
। (आठवां पुष्प ३-४-६४ ई०)

प्रश्न : यह है कि जब आत्मा का सम्बन्ध परमात्मा से है और
इन्द्रियों से भी है तथा इन्द्रियों का सम्बन्ध संसार से है, ये इन्द्रियां जब
विनाशकारी दूषित विचारों से कार्य करती हैं तो आत्मा उन्हें अपनी
मियां देना बंद क्यों नहीं कर देता