जब राष्ट्र में पुरोहित होते हैं तो एक दूसरे प्राणी की रक्षा होती है।
तथा वे प्राणी पुरोहित की रक्षा करते हैं। इस प्रकार राष्ट्र का प्राण है
समाचार तथा दूसरों की रक्षा करना। ।
शेष तीन आत्मा के अन्न हैं। १-चक्षु, २-श्रोत्र, तथा ३-घ्राण ।
अन्न का अभिप्राय है कि जो किसी वस्तु को ग्रहण करता है । अथ्थात्
ग्रीन
ही परमाणु वाद को अपने में शोषण करता है।
५-लक्ष-आहार :
सूर्य की किरणें नेत्रों का प्रकाश बन कर आती हैं, तो ये नेत्र प्रकाश
का प्रहार करते हैं। जैसे प्राण इस प्रश्न को ग्रहण करके मानव के साथी
.बना करते हैं, इसी प्रकार नेत्रों का साथी जो प्रकाश है, वह भी अन्न
कहलाया जाता है, आत्म ज्ञान कहलाया जाता है।
जो मानव नेत्रों का शोधन करके सुदृष्टिपात करता है, उसके नेत्रों
की ज्योति ज्यों की त्यों बनी रहती है।
वे मानव इस शरीर को छोड़ने के पश्चात् सूर्यमण्डल को प्राप्त होते
हैं । इसलिए हमें नेत्रों का शोधन करना चाहिए क्योंकि यह भी अन्न है।

मानव के नेत्रों में जो छिद्र होते हैं, उनमें सूर्य की किरणों के परमाणु
आगमन करते हैं, तो सूर्य के प्रकाश तथा आत्मा के प्रकाश का समन्वय हो
जाता है, तभी नेत्र इस संसार में दृष्टिपात किया करते हैं। वास्तव में
नेत्रों का अपना अस्तित्व नहीं होता क्योंकि वे तो दूसरों की सहायता से
कार्य करते हैं । इसीलिए नेत्रों को आत्मा का अन्न कहा जाता है। यह
नेत्र सूर्य की ज्योति को लाकर आत्मा से उसका समागम कराता है । जैस
मल, विक्षेप आत्मा और परमात्मा के मध्य में आ जाते हैं, इसी प्रकार
नेत्र सूर्य के प्रकाश तथा आत्मा के मध्य में एक पटल है, जो दोनों के प्रकाश
का समन्वय कराता है। इसलिए छात्रों को अन्न कहा जाता है।
६-श्रोत्र-प्रहार :
श्रोत्र उसे कहते हैं, जिसका दिशाओं से सम्बन्ध है । हमारे मुख से
जो शब्द निकलता है, वह एक क्षण समय में पृथ्वी की परिक्रमा कर लेता
है। श्रोत्रों में यह विशेषता होती है कि वह दिशाओं से इन शब्दों को लाकर
आत्मा से उसका मिलान कर लेते हैं ।
वैज्ञानिक सिद्धान्त है कि शब्द के साथ उसके उच्चारण करने वाले
का चित्र भी जाता है।

ये श्रोत्र दिशाओं से शब्दों को लाकर मानव को स्मरण कराते हैं ।
मानव के अन्तरात्मा के जो संस्कार होते हैं उनका समन्वय दिशाओं से हो
जाता है । दिशाओं में जो शब्द हैं, उनका सम्बन्ध अंतरिक्ष से होता है ।
अंतरिक्ष में शब्दावली रमण करती रहती है, तो वे लाखों वर्षों के शब्द
भी मानव के मस्तिष्क में विराजमान हो जाते हैं।
जो सांसारिक शब्द हैं, वे भी उसके अन्तःकरण में आ जाते हैं और

इन शब्दों का वाक्य रूप बन जाता है।

श्रोत्र नाम के अन्न को जानने वाले वैज्ञानिक लाखों वर्षों के शब्दों
को यन्त्रों में परिणत कर देते हैं ।
तात्पर्य यह है कि जैसे प्रश्न का प्रहार किया जाता है, ऐसे ही
हमारे श्रोत्र शब्दों का प्रहार करते हैं। हम इन श्रोत्रों को जानने वाले
चन ।

SAMAR SINGH YADAV.
। ७-घ्राण-आहार :

प्राण में नाना प्रकार सुगन्धियों (गन्धों) को ग्रहण करने वाली
(घाणेन्द्रियां) (सवतियाँ) होती हैं ! सुगन्ध को प्राप्त करना उसका अन्न
कहलाया गया है । पुलस्त्य, भारद्वाज आदि ऋषियों ने इस पर टिप्पणी
करते हुए कहा है कि घ्राण इन्द्रिय को जानने वाले प्राणी ऋषि होते हैं। वे
उस फल से, जो मानव के पास हो, अपनी घ्राणेन्द्रिय तथा नेत्रों का समागम
करके आत्मा और उदर से उसका संबंध करके, घ्राण से उसकी गन्ध को
ग्रहण करके अपने उदर की पूति उसके सूक्ष्म परमाणु से कर लेते हैं।
जो ऋषि-मुनि पवन आहारी कहलाए जाते हैं, वे ध्राणेंद्रिय को जानने
काले होते हैं । वे वायुमंडल से मन्द सुगन्ध को ग्रहण करते हैं। वे उस
अन्न को ग्रहण करते हैं जिससे घ्राण का सम्बन्ध होता है। उस अन्न को
पान करके तृप्त हो जाते हैं ।
व्यास तथा जैमिनि का सिद्धान्त है- जो बारह वर्ष पुरानी सुगन्ध
वायुमंडल में होती है, उसको योगीजन ग्रहण कर लेते हैं, तथा उसे अपनी
उदर पूर्ति का साधन बना लेते हैं।
अभिप्राय यह है कि यदि हम अपने जीवन को महान् बनाना चाहते
९, तो इन सात प्रकार के आहारों को जानने वाले बनें । इन में तीन प्ाहार
आत्मा के हैं तथा चार संसार की सामूहिक प्रक्रिया क लिए । इन सात
कार के अन्न से मानव की प्रतिभा का जन्म होता है।