उद्गीथ का स्वरूप :
संसार में प्रत्येक पदार्थ सपने-सपने स्थान पर गाना गा रहा है ।
एक पदार्थ का दूसरे से मिलान होता है उसी को उद्गित कहते हैं। जैसे
सूर्य का मिलान पृथ्वी से होता है, तो वह भी अपना उदगीत गा रहा है ।
उदगीत का अभिप्राय यह है कि उत्’ और ‘है’ दोनों का समन्वय करने के
पश्चात उद्गीत हो जाता है। उद्गीत का अभिप्राय यह है गोतम ब्रह्म’ ।
गीत का अभिप्राय यह है कि जो मानव हृदय से भावनाएं और तरंगे
उत्पन्न होती हैं, उन्हें उद्गम कहते हैं । उसी को उद्गोत कहते हैं

छन्द गायत्री आदि सभी गाने के रूपक होते हैं । इसीलिए उनका
संबंध सब लोकों के पदार्थों से होता है। जैसे यज्ञशाला में अग्नि प्रदीप्त
होती है। अग्नि औरत द्यु प्र समिधा’ का दोनों का मिलान हो करके
उद्गीत हुआ करता है । जब सामग्री का ‘स्वाद’ लेते हैं, तो अग्नि में एक
महान् प्रदीप्तपन आ जाता है, वह उद्गीत कहा जाता है। दो वस्तुओं के
मिलान करने का नाम ही उगीत कहा जाता है। हमें उद्गीत गाने वाला
बनना चाहिए तथा परभणी मानवीय प्रक्रिया को ऊंचा बनाने का प्रयास
करना चाहिए।
| (सोलहवां पुष्प १-८-७० ई०)
वेद की ऋचाओं को निचोड़ने का मन्तव्य है गायन, गायन को
निचोड़ने का मन्तव्य है छन्द, छन्द को निचोड़ने का मन्तच्य है ब्रह्म
विद्या । वह जो निचोड़ा हुआ ब्रह्म-विद्या रूपी रस है, उसे जो पुत्री और
ब्रह्मचारी पान कर लेता है, वह संसार सागर से पार हो जाता है। उसके
मस्तिष्क में ज्ञान नहीं रहता अज्ञानता का न रहना प्रकाश में आना है।
और उस प्रकाश को अपने में धारण करना ही ब्रह्म का ज्ञान, ब्रह्म को
साक्षात्कार करना है।
(छब्ब सवा पुष्प ३-१२-७३ ०)

वेद ही ब्रह्म विचार है :
वेद एक अनुपम प्रकाश को कहते हैं जो मानव के अन्तःकरण की
ज्योतियों को अथवा विभिनन्ताओं को जन्म देता है। वह अन्तःकरण के
अन्तर्द्वन्द्व को स्पष्ट करके प्रकाश में परिणत कर देता है। जैसे सूर्य की
किरण नेत्रों का देवता बनकर मानव को प्रकाश देती हैं, और मानव
उससे संसार के व्यापार में संलग्न हो जाता है । इसी प्रकार वेद रूपी सूर्य
के प्रकाश से हमारे अन्तःकरण के अन्तवन्त समाप्त हो जाते हैं तथा उसमें
जन्म-जन्मान्तरों से संस्कारों की उपलब्धियां अंकुर रूप में मानव

समीप प्राणी लगती हैं । अन्तःकरण, जिसमें मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार
का समूह एकत्रित है, उसमें दिव्य-ज्योतियों की जागरूकता होने लगती
है। इस पर विचार करने को ही ब्रह्म-विचार कहते हैं।
मानव का जितना भी आध्यात्मिक विचार होता है, उसकी
उपलब्धि वेद के द्वार से ही होती है। वेद केवल पोथियों में बद्ध नहीं
किया जाता । वेद तो मानव के अन्तःकरण की सुन्दर रश्मियों का नाम
ही
माना गया है।
वैदिक शब्दों की उत्पत्ति कहां से ?
श्री ब्रह्मचारी कृष्णदत्त जी ने किसी पूर्व जन्म में गुरुवर्य ब्रह्मा
जी से पूछा था कि ‘वेदों की शब्दावलियों की उपलब्धि कहां से होती
है ?’

श्री गुरुकुल ब्रह्मा जी ने समाधान किया, “जब हृदय और मस्तिष्क
दोनों का समन्वय हो जाता है, ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों के विषयों की
सामग्री बनाकर हृदय रूपी यज्ञ-शाला में उसकी आहुति दे दी जाती है,
जो इन्द्रियों की सहस्रों-सहस्रों प्रकार की धाराओं का जन्म हो करके,
उनका सम्बन्ध ब्रह्मरन्ध्र से होता है ।

ब्रह्मरन्ध्र में जो चक्र है, उसमें गति आती है। जब उसमें
देदीप्यमान गति आती है, तो उसका प्रकाश सहस्रों सूर्यों से भी अधिक
होता है।

ब्रह्मरन्ध्र की ज्योति की धारा का जो चक्र चलता है, तो उससे
नाना प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न होने लगती हैं उन ध्वनियों का
सम्बन्ध नाना प्रकार की धातुओं से होता है, तथा नदियों से होता है,
नाड़ियों का सम्बन्ध नाना प्रकार के लोक लोकान्तरों से होता है तथा
लोक से भी होता है, उन ध्वनियों का ‘अनहद-नाद’ कहा जाता है।
उन ध्वनियों को जान कर योगी जव लेखबद्ध करना है, तो उसी
ध्वनी से व्याकरण की उत्पत्ति होती है।
करोड़ों वर्षों के ऋषियों के विचार आज भी लोक में रमण करतें
हैं तथा उन विचारों को योगी अपने में प्रकाशित करके धारण कर लेता
है
। सूक्ष्म शरीर की रश्मियों को अच्छी प्रकार जान लेता है ।

जो ‘अनहद-नाद’ बजता है, उससे गायत्री तथा छन्दों का निमीण
होता है । गायत्री उसे कहते हैं, जो गाई जाती है । जो ब्रह्मरन्छ