है। मन में विभाजन करने की शक्ति है तथा उसका सम्वन्ध चित्त से
रहता है, इसीलिए चित्त में जो जन्म-जन्मान्तरों के संस्कार हैं या पहले
दिवसों के या बाल्यकाल के संस्कार हैं, यह मन उनको आत्मा के समीप,
उसके प्रात्म-दपण में तथा उसको आत्मा में लाता रहता है। वही स्वप्न
रूप में यह आत्मा देखता रहता है ।

वह मन प्रकृति से बना होने के कारण और इसका सम्बन्ध चित्त,
बुद्धि से होने के कारण इन्द्रियों के विषय में प्रोत-प्रोत होकर कही नाना
प्रकार की विषय वासना में लग जाता है, कहीं मग्न हो जाता है, कहीं
सुन्दर जलाशयों के तट पर विचरण करता है, कहीं निर्धन से अधिराज
बनता है, कहीं अधिराज से निर्धन ।

सुप्त अवस्था में आत्मा का स्वरूप प्राण के साथ रहता है।
क्योंकि प्राण विना यह आत्मा संसार में, शरीर में कोई कार्य नहीं कर
सकता। वास्तव में संसार में यह आत्मा, यह प्राण ही जागता है और सब
सुषुप्ति अवस्था में परिणत हो जाते हैं।

प्राण शक्ति का केन्द्र, परमाणुवाद का केन्द्र मन कहलाया गया है।
यह प्राण ही मन के आश्रित होकर लोक-लोकान्तरों को क्रियाशील बनाता
है। जव प्राण भी आत्मा के साथ नहीं रहता तो अात्मा का स्वरूप चेतना
होती है। चेतना के कारण ही मानव का शरीर जीवित रहता है, चेतना
वत् रहता है । आत्मा की तो विवेचना तथा ज्ञान है, वह इस प्रतिभा में
रमण करता है1

त्वचा का स्वरूप :

प्रश्न : यह चमड़ी का लेपन किन-किन प्रधान तत्वों से वनता है ‘
उत्तर : जब ये परमाण माता के गर्भ में जाते हैं तो वहीं जल
प्रधान, प्राप्त-प्रधान होता है। पृथ्वी के कण भी उसमें विशेष रूप से होते
हैं। उन्हीं परमाणु से, उनकी विशेषताओं से मानव शरीर की सुन्दर
रचना होती है तथा लेपन भी उन्हीं से होता है। इस लेपन में
प्रकार के भेद होते हैं ।

कहीं-कही म परमाण लगे हैं कि प्रकृति तत्व प्रधान हो जाता।
गह जल की प्रधानता होती है, कही चायु की प्रधानता होती है

पृथ्वी की प्रधानता होती है । इसमें नाना तत्वों की प्रधानता होने के नाते
त्वचा का रंग-रूप कहीं सुन्दर होता है, कहीं मध्यम होता है, कहीं कुरूप
होता है।

वाणी का स्वरूप : वाणी में दो तत्त्व कार्य करते हैं। कहीं चन्द्रमा
करता है, कहीं अग्नि करती है। इनके मध्य में मिश्रित होने वाला जल
है, उसी में दोनों तत्त्व प्रधान हैं।

ग्रीवा ग्रीवा में भी दो तत्व कार्य करते हैं। अग्रिम भाग का
सम्बन्ध पृथ्वी से है और अन्तिम भाग का संबंध जल से है।

श्रोत्र : स्तोत्र के अग्रिम भाग का सम्बन्ध अंतरिक्ष से है और
आंतरिक भाग का संबंध वायु से रहता है।

प्राण : प्राण के अग्रिम भाग का सम्बन्ध पृथ्वी से होता है और
आन्तरिक भाग में वायु प्रधान होता है।

माता के गर्भ में कुछ स्वर्ण होता है, कुछ शोण होता है, चन्द्रणीय
होता है। नाना प्रकार की धातुओं का मिश्रण हो करके उसकी पात
बनाई जाती है । पात बना करके माता के गर्भ में स्थित विचित्र यन्त्र द्वारा
गर्भ स्थापन के पश्चात् स्वतः: ही बालक के शरीर पर लपन हो जाता है।
लेपन में जो प्रधान होता है, अग्नि उसे शुष्क बनाता है, पृथ्वी से उसका
तत्त्व आता है तथा तीनों पदार्थों का मिश्रण हो करके लेपन हो जाता है ।
वायु के द्वारा उसमें छिद्र बन जाते हैं।

प्रश्न : मानव शरीर में विराजमान आत्मा को प्रेरणा कहां से प्राप्त
होती है ?
उत्तर : माता के विचारों में उसके सुंदर विचारों की रचना होती
रहती है। कहीं सतोगुण प्रधान है कहीं रजोगुण, कहीं तमोगुण, । ये तीनों
गुण उनके संस्कार और विचारों के अनुसार मानव के शरीर में वास
करते हैं।

प्रश्न : नास्तिक इस शरीर रचना को मन और प्राण की मानता है,
प्रभु की नहीं ?

उत्तर : यहां तक तो यथार्थ है कि मन और प्राणों से रचना होती
है। किन्तु इन मन और प्राणों की जो रचना है, जो मौलिकता है, उनको