अन्यथा हमारा जीवन अन्धकार में डूबता रहेगा।

(पांचवां पुष्प १८-१०-६४ ई०)

प्रातःकाल की बेला मे माता अनुसूया तथा अत्रि मुनि एक स्थान
पर विराजमान होकर माता गायत्री का अनुसरण किया करते थे। जिस
गायत्री से यह संसार रचता है तथा ऊच्र्ब गति को प्राप्त होता है और इसी
में लुप्त हो जाता है ।
(पांचवां पुष्प १८-१०-६४ ई०)
उद्गीत
वह प्रभु कितना अलौकिक है, इसका वेदों में सुन्दर निरूपण किया
है। मानव प्राय: यह विचारता है कि तू गुणगान वाणी से गा रहा है,
परन्तु ऐसा नहीं। वेद-वाणी का जो एक उद्गार होता है वह अन्तरात्मा
से चला करता है। क्योंकि अन्तरात्मा की पिपासा अपने सखा के लिए
होती है और माता-पिता के लिए होती है। (वाईसवां पुष्प पृष्ठ-७५)
परमात्मा के गुणों का वणन गायन रूपों में ही होता । इसको
है
गाना ही चाहिए। किन्तु गायन उसी का हो जिसका उद्गीथ होता है।
प्रभु है।
जिसका उदय होता है, उसी का उद्गीत होता है। उदय होने वाला वह
किन्तु वह तो सदा रहने वाला है अतः उसके उदय होने का वाक्य
मिथ्या हो जाता है, यहां उदय होने का अभिप्राय यह है कि वह परमात्मा
सर्वत्र रहने वाला है। कण-कण में उसकी ज्योति व्याप रही है। उसको
उद्गीत इसलिए कहा जाता है कि उस मानव की वाणी में सत्यता की
महती त-प्रोत हो जाती है।
गीत वहां गाता है जो सत्यवादी होता है 1 ऋषियों का कथन है
कि सत्य में ही प्रभु रमण करते है। जिस मानव में सत्यता का गुण हो
जाती है, उसमें प्रभ का उद्गीत होता है 1 उसका उस वाणी के संसर्ग में
उदय होने लगता है। इस प्रकार उस प्रकाश के आंगन में मानव का उदय
होने लगता है।

उद्गीथ गाने से मानव का उदय होता है
स्वप्नावस्था में मन आत्मा के प्रकाश में उद्गीथ हो जाता है। इसी
शरीर में यद्यपि नदी, पहाड़ तथा नाना प्रकार के भोग-विलास नहीं होते,
किन्तु उस समय वे सब उत्पन्न हो जाते हैं । यह तव परमात्मा के प्रकाश
में ही तो उद्गीत गाता है। मानव की वाणी का सम्बन्ध हृदय से होता
है।

उद्गीथ गाने से उस मानव का उदय होता है, प्रभु का नहीं
उदगीत मन तथा वाणी के द्वारा गायन रूपों में गाया जाता है, प्रभु
की प्रतिभा का वर्णन गायन रूपों में ही होना चाहिए ।

सत्य की प्रतिष्ठा के पश्चात उद्गीथ का अधिकारी होता है
| वेद के पठन-पाठन में जो स्वर हैं वे गीत कहलाए जाते हैं। ये
वाणी तथा सत्यता के द्वारा गाये जाते हैं। वेद का उच्चारण करने का
वही अधिकारी होता है, जिसकी वाणी सत्य होती है। सत्य की प्रतिष्ठा
के विना वेद का उच्चारण करना व्यर्थ होता है। उसका उद्गीत सुन्दर
गायन-रूपों में नहीं गाया जाता। वह तो केवल एक पक्षी की भान्ति
रटन्त-विद्या हो जाती है। जब वह अपने को प्रभु में तन्मय करके गाता है
तो उसका नाम उद्गीत है ।
(सोलहवां पुष्प ४-८-७१ ई०)

हृदय से मंत्र उच्चारण करने पर ही सानंद की प्राप्ति :
जिस वेद-मन्त्र में मानव का हृदय जुड़ा हुआ होता है अथवा उससे
जीवन का सम्बन्ध होता है, उसकी प्रतिभा में एक महत्ता की ज्योति
जागरूक हो जाती है। जब तक वेद-मन्त्र के साथ हृदय का मिलान नहीं
होता, तब तक उसमें आनंद भी प्राप्त नहीं होता। मानव प्राय: शब्दों को
अच्छी प्रकार जान नहीं पाता परन्तु मानव के हृदय से उच्चारण किया
हुशा शब्द मानव के मन को बहुत प्रिय लगा करता है ।

वेद का ज्ञान ग्रीर विज्ञान अनन्त है। इसका अनुपम प्रकाश मानव
के
हृदय को पवित्र बनाता चला जाता है । वह द्यु-लोक में घृत-समिधाओ्रं
के सहित शब्दावलियों में प्रदीप्त हो रहा है । जब उसका शब्दावलियों
से विशेष सम्बन्ध हो जाता है, तो मानव का हृदय विभोर हो जाता हैं
गर वेद की प्रतिभा में एक महत्ता की ज्योति जागरूक हो जाती है ।
जब कोई महापुरुष लेखबद्ध करने लगता है तो जितना उसके
हृदय से सम्बन्ध होता है, मन की एकाग्रता होती है, उतना ही उसके द्वारा
लख गए शब्दों में व्यापक बाद गाता चला जाता है। इसी आधार पर
जब हम वेद की प्रतिभा पर विचार करते हैं, तो विचारक का जितना
चरित्र, सुविचार तथा मन की सूक्ष्मता होती है, उतनी ही शब्दावल में
विचित्रता गाती चली जाती है, उतनी ही मात्रा का दिग्दर्शन होने लगता
है ।
(पन्द्रहवां पुष्प १२-४-७१ ६०)