को देखता है, तो सोचता है कि मैं पाप करने कहा जाऊ? क्योंकि सब
जगह मेरी माता है। यदि माता ने पाप को जान लिया तो दरार दे ।
ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाने पर वह पवित्र गायत्री उस मानव को अपने
कंठ में धारण कर लेती है।

इस प्रकार यह मानव योगी वनकर पिता परमात्मा तथा माता
गायत्री का बालक बनता है। एक स्थान प्रकृति-गायत्री-माता तथा एक
स्थान से पिता ब्रह्म उस महान आत्मा को अपने में धारण कर लेते हैं।

प्रकृति-माता तथा पिता-परमात्मा के मध्य जो विरोध था, उसका
इस महान् आत्मा ने नष्ट कर दिया। प्रकृति को वैज्ञानिक रूपों में अप
नाया और परमात्मा को उपासना रूप में अपनाकर वह उपासक ज्ञानी
और वैज्ञानिक योगी कहलाता है। (पांचवा पुष्प १८-१०-६४ ई०)

मानव शरीर के चौबीस तत्वों से गायत्री का सम्बन्ध :
संसार में जितने भी वेद-मन्त्र हैं, प्रत्येक वेद-मन्त्र उस महान् प्रभु
की आभा है। उसी का गान गाते रहते हैं। परन्तु ऋषि-मुनियों ने वेदों से
उस वस्तु के व्यवहार में साकार रूप दिया, जिसका जीवन से घनिष्ठ
सम्बन्ध माना जाता है। जैसे गायत्री :-२४ अक्षरों वाली गायत्री कह-
लाती है। उसमें तीन व्याहृतियां मानी जाती है।
हमारा यह स्थूल मानव शरीर बीस तत्वों से बना हुआ है।
प्रत्येक अक्षर का सम्बन्ध प्रत्येक तत्व से माना गया है इस मानवीय
तथ्य को भी जानना है

उस महान् प्रभु की प्रतिभा के विभाग किए जाते हैं। कुछ शब्द
इस प्रकार के हैं, जिनका सम्बन्ध प्राणों में हैं, कुछ का मन से, कुछ का
मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार से तथा कुछ का इन्द्रियों से है। परन्तु
प्रत्येक अक्षर का जो बोधक है, यह हमारा शरीर है। ऋषि-मुनियों ने इन
वाक्यों को साकार रूप दिया, साकार रूप देने का एक ही अभिप्राय था कि
इसके ऊपर अनुसंधान कर सक 1

गायत्री का अभिप्राय है, जो गाई जाती है। वेद का प्रत्येक शब्द
गाया जाता है । जब ऋचा को गाते हैं तो मन मग्न हो जाता है ।
(पच्चीसवा पुष्प १२-३-७३ ई०)

गायत्री प्रार्थना

हे माता गायत्री ! तू अपने पुत्रों को अपने कंठ में धारण

जिससे हम तेरे कण्ठ में, तेरी आनन्दमयी गोद में विराजमान होकर उस
प्रानन का अनुभव कर सक । तू सुख के देने वाली है, पवित्र बनाने वाली
है। तू संसार को माता तथा ब्रह्मा की पुत्री कहलाती है। तेरी तीन प्रकार
की व्याहृतियाँ हैं, जो वेद में उपलब्ध है। हे माता ! तु संसार को पवित्र
वनाने वाली है। जो तेरा अनुकरण करता है, वही संसार सागर से पार
हो जाता है। जो तेरी इस भावुकता में करुणामय-आनन्द को पान करने
वाला है, वह इस संसार की कटुता में, जो एक दूसरे का विरोध है, उसे
नष्ट कर देता है । हे माता ! जब यह हृदय तेरी भावुकता से ऐसा
परिपक्व हो जाता है, तो जैसे सूर्य की किरणों से यह संसार प्रकाशमान
हो जाता है, ऐसे ही ज्ञान रूपी किरणों से हमारा हृदय प्रकाशमान हो
जाता है। १-मल, २-विक्षेप गरर ३-पर्यावरण दूर हो जाते है।

उस समय हम अपने ‘प्रातः भूषणम् अग्नि की आराधना करते हुए
अपनी आत्मा को पवित्र मानते हैं । हे माता ! तू हमारी आत्मा को
वास्तव में पवित्र करने वाली है । हे माता ! जब तेरा अनुकरण करते हैं,
तेरे घर में तेरी महत्ता की आराधना करते हैं, तो उस समय हमारे हृदय
में जो नाना प्रकार के पाप हैं, वे सब भस्म हो जाते जैसे अग्नि ईंधन
को नष्ट कर देती है । हे माता ! आप ही हमारी लक्ष्मी, श्री, माता और
राजा हैं। हम आपको चुनौती (अाह्वान) देते रहें । संसार में सिवाय
प्रापक किसी को नमस्कार न करें । ‘नम’ हो तो केवल
पाप के लिए क्योंकि आप हमारे अधिराज हैं । आप पापों को नष्ट करने
वाली है।

हम आपको नमस्कार करते हुए आपकी शरण में रहें, हृदय में,
वाणी में हर समय आपका उच्चारण करते रहें, आपकी आनन्दमय ज्योति
में रमण करते रहें।

हे माता ! हम बारम्बार तुझे पुकारते चले जा रहे हैं । तु हमारे
पापों को नष्ट कर और ऐसा पवित्र बना कि हम संसार में जन्म लेते हुए
यौगिकता को प्राप्त करते रहें, तेरे गर्भ में आएं। अपने हृदय को ऐसा
पवित्र वनाते रहें जिससे तेरी गोद में, तेरी शरण में आ सकें । हमें अपने से
दर न कर, यदि हम तेरे से दूर हो गए तो हमारा जीवन व्यर्थ होता चला
जाएगा। हमारे जीवन में न प्रीति रहेगी, न आनन्द रहेगा। यदि हमार
हृदय में आपकी ज्योति रहेगी तो हम संसार को ज्योतिष्मान कर सकते