२ – ३-३ दान कर का भी है। दूई को प्राड के हैं। इनके
इन इन्द चाई।
(पाचवा पुष् १८-१०-६४ ई०)

जो कामधेनु है
कामधेनु नाम ही सरस्वती बी गोत्र का है । । जब मानव इस
अनार में प्रारर उस काम बेनु प्रमृतमब को ग्रहण करता है पौर अपने
कषट मे उसके दूध को पान करता है, तो उसका कल्यण हो जाता है ।
जब ननद इस संसार से उत्थान होकर जाता है. तो वह अमृत-लोक मे
चता जाता है। राजा इन्द्र के राष्ट्र म चता जाता है। इन्द्र के पास एक
काम है। मानव संसार में कामवेनु को प्राप्त करने के लिए पाता है।
ने त करके मानव जीवन का कल्याण हो जाता है । इन्द्र नोक या
पनृत-लोक वे ही हैं, जिसे मर्द-तोक वा ब्रह्मलोक कहते हैं जहां ब्रह्म
रा वास होता है।
(चोदा पुष्प २१-४-६४ ई०)
गायत्री और छन्दः ।
गायत्री गाई जाती है तया छंदों का हृदय में धारण किया जाता
। छन्द उसे कहते हैं कि आभा का जन्म होकर चित्त में जो तरंगे
पन्न होती हैं, उनका नाम इंदल है। वेद के मंत्र को गाया जाता
है। जब इसे स्वर से गाया जाता है, तो इससे दो वस्तुएं उत्पन्न होतो
है।

१-जो मानव वेद-वाणी को गाता है. उसकी वाणी में सत-बाद प्रा
जाता है ।

२-तवाद आ जाने पर सत में मधुर ओपन प्रा जाता है ।
जिसकी वाणी में सतबाद और मथरपन दोनो हो, तो वह मानव
सामान में इतना हो जाता है । जिस गांव में सवाद तो हो, किन्तु मघुर
पन न हो, तो उस मानव के सुकृतों का हनन हो जाता है। यह बात
गायत्री अौर छन्दों से सिद्ध होती है।

गायत्री द्वारा आध्यात्मिक-यज्ञ से लाभ –
गायत्री का वजन करने वाला प्राणी जब अन्तरात्मा में यज्ञ करता
है, तो उसे चार वस्तुएं प्राप्त होती हैं।

१-शब्द उच्चारण करना ।
२-मथुरपन मे जाना ।
३-तूप आ जाना। इसके पश्चात

४-क्रोध का सत रूप में परिणत हो जाना ।

जो मानव गायत्री गान को नहीं गाता, वह मानव जीवन लेकर
संसार में अभागा ही बना रहता है। गाना नहीं गा सकता है, जिसका अन्तः
करण शान्त होता है तथा चित्त शांत होता है । चित्त तभी शान्त होता है,
जय उसका भोजन उसे प्राप्त होने लगता है।

अन्तःकरण अथवा चित्त का भजन है ज्ञान तथा विवेक । जव
इन्द्रियों के नाना प्रकार के विषयों में आस्वादन से मानव का अात्मा उप
राम हो माता है, तो उसे ज्ञान और विवेक पाता है । इस अन्न को प्राप्त
करके चित्त स्वयं शान्त हो जाता है 1 उसकी वाणी में मौनपन तथा
और जस्ता पर जाती है। वह मानव संसार में भाग्यशाली है।

यह गायत्री-माता है। जैसे जब कोई बालक माता के अनुकूल
चलता है, तो वह प्रसन्न रहती है
तथा
प्रतिकूल होने पर वह दूर हो जाती
है इसी प्रकार यह अक्षरों वाली गायत्री-माता है, इसमें जो तीन व्यवहृतिएं
है, वे तीन शब्द है । ये मानव को ऊर््वगति को प्राप्त करा देते हैं। यह
चौबीस अक्षरों वाली गायत्री है।

जव छन्द सहित अन्तरात्मा से इसका यज्ञ करते हैं, तो मानव को
सर्व वस्तुएं प्राप्त हो जाती हैं।

जब मानव मे ममता महीं रहती तो उसमें कर्तव्य की भावना ग्रा
जाती है और वाणी में मधुर ओपन आ जाता है। उसका निरन्तर तप सिद्ध
हो जाता है।
(इक्कीसवां पुष्प-पृष्ठ ६६)
गायत्री की व्याहृतियां :
प्रत्येक वेद-मन्त्र गायत्री है। क्योंकि प्रत्येक वेद-मन्त्र में ज्ञान और
विज्ञान है। इसकी तीन व्याहृतियाँ होती हैं। जैसे माता का जीवन तीन
भागों में बांटा होता है।

१-पुत्र को गर्भ में धारण करना ।
२-उत्पन्न होने पर लोरियों का पान कराना ।
३-युवक होने पर उसको अपने हृदय से पृथक कर देना ।
इसी प्रकार गायत्री की व्याहृतियां हैं। जब मानव इस गायत्री।
माता के गर्भ में जाने के लिए लालायित होता है, तो जहां भी देखता है,
वहीं माता को देखता है। जहां दृष्टिपात करता है, वहीं माता का दृश्य
उसके समक्ष है। माता उसकी प्रतीक बनी है। जब वह सब जगह