एक समय भृगु आश्रम पर ऋषियों की सभा में महर्षि मुदगल त
महर्षि शांडिल्य जी ने प्रश्न किया कि संसार में योग की कितनी ग्रा
है तथा योग के द्वारा योगी अपनी आत्मा को कहां-कहां ले जा सकता है ?

योग की ३६ प्रकार की गतियां:
महर्षि भृगु जी महाराज ने बताया कि योग की गति ३६ प्रकार
की होती हैं। वे जो ३६ प्रकार की गतियां है, वे आत्मा का सूक्ष्म रूप
हैं । आत्मा के लिए जो योग का प्रारम्भ है, वह तीन प्रकार के शरीरों को
जानने का नाम योग है। १-स्थूल, २-सूक्ष्म और ३-कारण शरीर ।

कारण शरीर में भी पठ्चमहाभूतों
का
मिश्रण रहता है। क्योंकि
वह पंचमहाभूतों की सूक्ष्मतम गति कहलाई जाती है। सूक्ष्म शरीर में
जब सतोगुण अधिक प्रबल होता है और जब सूक्ष्म गति इसको प्राप्त हो
जाती है तो यह यौगिक श्रात्माओ्रों में रमण करने लगता है। मानव की
जितनी सतोगुणी प्रवृत्तियां अधिक होती हैं, उतना ही आवागमन में
परिणत रहता है ।

जितनी तमोगुणी, रजोगुणी प्रवृत्तियां रहती हैं, उतना ही आवागमन
(जन्म-मृत्यु) निकट होता है ।

परन्तु जिनका सतोगुण का प्रवाह ऊंचा होता है, उन सतोगुण का
उड़ान अधिक होती है। यौगिक उड़ान उसके साथ में होती है तो उन
आत्मा अन्तरिक्ष में मुक्त आत्माओं, देवताओं के साथ रमण करती रहता
है।
(पच्चीसवां पुष्प १४-८-७२ ई०)
जब योगीजन प्रकृति पर शासन कर लेते हैं, जिसमें शून्यता
पर
जड़ता है तो वे जान लेते हैं कि वे कौनसी गति पर चले गए है ।

(आठवां पुष्प ३-४-६४ ई०)
मन और प्राण को एकाग्र करके योग के द्वारा इस प्रकृति का वि
स्वत: ही मानव के समीप पर जाता है गोर यह स्पष्ट भी हो जाता है ।
यही प्रकृति पर आधिपत्य करने का एकमात्र मार्ग है ।

(बिसवां पुष्प २९-३-७३ ई०)

योगी त्रिकालदर्शी होता है :

परमपूजय ब्रह्मचारी कृष्णदत्त जी महाराज ने पूर्व जन्म में महर्षि
श्रृंगी जी महाराज के रूप में परम पूज्य गुरुवर्य ब्रह्मा जी महाराज से थोगी

के सम्बन्ध में प्रश्न किया तो गुरुवर्य ब्रह्माजी महाराज
ने उत्तर दिया ।
उत्तर : यौगिक आत्मा निर्मल हो जाती है। उनकी इडा, पिगला
और सुषुम्णा नाड़ियां इतनी सूक्ष्म और पवित्र हो जाती हैं कि श्रात्मा के
सहित जब उनमें प्राणों का संचार होता है और इडा, पिंगला नाम की
नाड़ियों से वर्तमान समय में भौतिकवाद को लिया जाता है तो भौतिकवाद
उसके अन्तःकरण में समाहित ही है।

जिस भाषा को वह लेना चाहता है, वह भाषा भी उसके समीप
आ जाती है। परन्तु यह कार्य योगियों का ही है, साधारण ग्रात्माग्रों का
नहीं।

हमें योग में सन्देह नहीं करना चाहिए। योगी बनने की हमारी
प्रवल इच्छा होनी चाहिए। योगी बनेंगे तो हमें प्रतीत होगा कि वास्तव
में जब हम परमात्मा के प्रति इन नाना प्रकार के वाह्य आडम्वरों को अपने
में शान्त करते जाएंगे और आत्मा का ब्रह्मरन्ध्र में मिलान होने पर वर्त
मान काल, भूतकाल और भविष्यत् काल इत्यादि सवसे मिलान हो जाता
है । जो आत्मा भूत, भविष्य और वर्तमान को नहीं जानता वह योगी
नहीं कहलाता । परमात्मा को परमात्मा से जो सूक्ष्म ज्ञान होता है, वह केवल
इतना ही सूक्ष्म होता है कि परमात्मा भौतिक सृष्टि को रचता है, परन्तु
योगी एक प्रकृति (संकुचित अर्थात् सीमित) सृष्टि को रचा सकता है।
संसार में जो यह सृष्टि हमें दिखाई दे रही है, उसे योगी नहीं रचा सकता।
परन्तु वह भूत, भविष्यत् की वार्ता को अवश्य जानता है।

योगी परमात्मा के घर में रहता है। गीत: वह जानता है कि पर
महात्मा के गर्भ में क्या है और परमात्मा का संस्कृत (रचना) कहा जा
रहा है? उसके ग्रनुकल उस आत्मा में वह वाक्य प्रारम्भ होने लगते हैं।
क्योंकि वह आनन्दमय है और यौगिकता में है।

योगी को त्रिकालदर्शी मानने से परमात्मा का विधान समाप्त नहीं
ता। परमात्मा सदैव रहता है तथा उसका विधान उसके साथ रहता
१ वद-ज्ञान परमात्मा ने परमात्मा के लिए निर्धारित किया है। वेद को
बना विचारे वह प्राणी सीमित युद्ध के अनुसार कुछ भी उच्चारण कर
ता है। किन्तु वेद को विचारने पर वह ऐसा नहीं कह सकता। जो