क्योंकि उसको उनकी अनुभूति होने लगती है। जब प्रकृति होने लगी।
तो वह उसको अपने में ग्रहण करने लगता है । जब ग्रहण करता है।
से वह तप्त रहता है । नाना वृक्षों के फलों के जो पोषक त
जब मन के ऊपर संयम कर लेता है, बुद्धि और मन दोनों का समन्वय होने
पर उसका श्राहार भी सूक्ष्म वन जाता है। उनके रसों का स्वादन वह
संकल्प मंत्र से करता है और तृप्त होने लगता है।

प्रहार केवल स्थूल अन्न ही नहीं होता। एक अन्न जो वायुमण्डल
में विचरण करता है, वह भी अन्न होता है। परमाणु गैरों से मानव का
शरीर बना है, परमाणु इसका आहार है। उन परमाणुओं को योगी वायु
से भी ग्रहण कर लेता है, जल से भी और अन्तरिक्ष में रमण करने वाले
परमाणुओं को तथा दो-लोक से भी ग्रहण कर लेता है। उनसे भी शरीर
की तृप्ति हो जाती है। एक समय वह आता है कि स्थूल शरीर को भी
त्याग दिया जाता है, सूक्ष्म शरीर रह जाता है। सूक्ष्म का भी विच्छेद
होकर कारण शरीर रह जाता है। कारण का सम्बन्ध उस प्यारे प्रभु से
होता है। प्रभु के गर्भ में वह कारण, लिंग शरीर भी अस्वातों में रह जाता
है । परन्तु वह उसके आंगन में विचरण करने लगता है।

(पच्चीसवां पुष्प ११-११-७२ ई०)

योगियों की गतियाँ :

योगियों की नाना प्रकार की गतियां होती हैं। जैसे १-जीवनमुक्त,
२-सन्धेवनी, ३-जनता जनार्दन में समाधिस्थ होना, ४-शोभना
५-अश्वेत आदि ।

१-जीवन मुक्त उस प्राणी को कहा जाता है जो मानव स्थूल शरीर
की प्रक्रिया को जान लेता है । आवासों की गति में उसकी प्रवत्ति हो जाती
है ।जो मानव योगी बनना चाहता है, उसे प्रपने मानव-शरीर में अज्ध
प्रत्यंग का प्रीम् रुपी धागे में पिरो देना चाहिए ! यह तभी हो सकता
*है, जब प्रत्येक शवास के साथ श्रो३म् का तारतम्य हो जाता है। मानव के
प्रत्येक आवास के साथ हृदय प्रर मस्तिष्क का समन्वय प्रर मिलान कराने
माला यह ‘श्रोम’ रूपी धागा ही है । जैसे धागा मनकों के माला के रूप
में परिणत कर देता है, परमात्मा का ऋत् लोक-लोकान्तरों को, सौर
मंडलों के रूप में परिणत कर देता है, आकाशगङ्गा गङ्गा आदि का निमणि ही

जाता है इसी प्रकार ‘ओ३म्’ के द्वारा हमारा तारतम्य होना चाहिए।
जीवन मुक्त प्राणियों को पाप और पुण्य दोनों नहीं व्यापते ।

१. वह इस प्रकार का योगी होता है कि वह जब चाहे, बिना माता
के गर्भ में आए शरीर धारण कर सकता है । वह इस प्रकार कर लेता है
कि जो उसका परमाणुवाद प्राण के द्वारा, श्वासों की गति के द्वारा वायु
मंडल में, विद्युत में रमण कर रहा है, द्यु-लोकों में उसी प्रकार प्रतिष्ठा हो
रही है, उसी में वह रमण कर रहा है। उन परमाणुओं को एकत्रित करके
वह स्थूल शरीर में परिणत हो जाता है तथा क्षण समय में उसे त्याग भी
देता है। जीवन मुक्त प्राणियों का परमाणुवाद पर आधिपत्य हो जाता
है, उसी में वे गतिशील हो जाते हैं।

वह यह जानता है कि अपने यन्त्र को बनाने के लिए, उसे कितने
परमाणु जल के तथा कितने वायु के चाहिए। वह हृदय और मस्तिष्क का
एकाग्र करके उन परमाणु ग्रहों का मिलान भी कर देता है। उस समय
उसके लिए सूर्य, चन्द्रमा आदि मण्डलों की यात्रा सुगम हो जाती है क्योंकि
वैसा ही उसका शरीर बन जाता है। (चौदहवां पुष्प २-११-७० ई०)
योगी शब्दों का प्रचार कैसे करता है ?

जैसे भौतिक-विज्ञान वेत्ता शब्दों के यानों का निर्माण करता है, इसी
प्रकार योगी भौतिक क्षेत्र में, योगियों के समाज में विराजमान हो करके
प्राण के द्वारा व्याहत गति से अपने शब्दों को संसार में प्रसारण कर
सकता है 1 वह जो प्राण की अव्याहत गति है, उसका सम्वन्ध सूक्ष्म मण्डल
से रहता है । वह योगी उन महान् आत्माओं से, जो उसके निकट हैं, उनसे
वार्ता कर सकता है, उनके सत्संग भी कर सकता है, उनसे विचार-विमर्श
भी करता है । वह योग की स्थिति-गति’ कहलाई जाती है ।
योग की भिन्न-भिन्न प्रकार की गति मानी गई है। हमें योग की
उन सिद्धियों में नहीं जाना चाहिए जो प्रकृति में हमें तन्मय करा देती है,
प्रकृति के क्षेत्र में महिमावादी बना देती है। सिद्धियों के क्षेत्र में जो योगी
चला जाता है, उसका विनाश हो जाता है, उसकी आत्मा का हनन हो
जाता है।

प्राय: वह संसार में प्रसिद्ध तो हो सकता है परन्तु अपनी आत्मा के
तत्र में वह प्रसिद्ध नहीं होता, न योगियों के क्षेत्र में प्रसिद्ध होता है

(पच्चीसवा