ब्रह्मरन्ध्र के निचले विभाग में पीपल के पत्ते के अर्ध-भाग के सामान
एक स्थल होता है। उसमें तीन प्रकार की नाड़ियां होती है
२. सिम भुक् और ३. ९ वेतबेतु । इनका सम्बन्ध १-एंड, २-पिगला ?
है । उन नदियों में से ७२-७२ धागों का जन्म होता रहता है तथ
धाराओं में ऐसा प्रवाह उत्पन्न होता रहता है कि जब समाधिस्थ हो
मन पर प्राण की एकता करके सहकारिता में लाया जाता है, तो उसे

एक हत्या का जन्म हो जाता है । मन और प्राण के एकाग्र होने पर उता.
अर्य की ऊध्र्यगति ब्रह्म में चरने वाली एक अबाध गति मानी जाती ।
उसमें एक महत्ता का जन्म ब्रह्म-व्याप्य में हो जाता है। उस समय वहा की
अबाध-गति ऐसी मात्रा में परिणत होने लगती है कि उससे संसार में
महत्ता का जन्म होने लगता है। ब्रह्मचर्य की अबाध गति विशेष श्र प्रकल
हो जाती है। एक-एक नाड़ी से सहस्रों धाराओं का जन्म हो जाता है।1
इन्हीं धाराओं के साथ प्राभाएं और तरंग उत्पन्न होती रहती हैं। इन
आभा वा सम्बन्ध मानव के चित्त से होता है। लोक-लोकान्तरों की
आभास की तरंगों का चित्त से सम्बन्ध होता है । इनके सम्बन्ध होने के
कारण जब चित्त के देश में मानव की विशेष सुरति (विशेष लग्न) हो
जाती है, तो वह योगी इस ब्रह्माण्ड का दर्शन कर लेता है। अतः मानव
को अपनी प्रवृत्तियों को ब्रह्म में विचरण करा देना चाहिए।

। (अठारहवां पुष्प १३-४-७२ ई०)
योग की अग्नि : ।
जब योगी प्रज्ञान करने के साथ-साथ बाह्य जगत् और ग्रान्त
रिक जगत् का अनुसन्धान करता है तो वह गार्हपत्य नाम की अग्नि की
पूजा करता है। गार्हपत्य अग्नि की पूजा करने के पश्चात् वह आन्तरिक
जगत् और बाह्यजगत् दोनों को एकता में लाने का प्रयास करता है। आगे
वह अव्याहत-गति को प्राप्त करता हुआ गार्हपत्य अग्नि से दूर हो कर क
यहां तीनों अग्नियों का समावेश हो जाता है। तब वह संसार के एक-एक
परमाणु को व्यापार में दृष्टिपात करता है । वह एकांत में से
=होकर जानता रहता है कि यह संसार क्या है ! ब्रह्म-रचना क्या है ? हम
क्या हैं ? वनस्पति क्या है ? ये गुण क्या हैं ?
इसको जानता है वह समाधिस्थ होकर चकना नाम की प्रग्नि
पूजा करता है। श्रेणियों को पूजा करता हुआ, प्रत्येक वस्तु में, कण-कणा में
-वह विज्ञान और प्रसारण को दृष्टिपात करता है । प्रसारण को दृष्टिपात

हुए, वह उनके संगठन भी करने लगता है और उसको बाह्य-जगत
1 दृष्टिपात करता हुआ आन्तरिक-जगत् में जाता है, अपने मन और प्राण
जगत् में जाता है । उसे अपनी अन्तरात्मा में सर्वे जगत् दृष्टपात आ रहा
। ऐसे याज्ञिक पुरुष का संसार में कोई शत्रु नहीं होता ।
वेद का ऋषि कहता है कि एक-एक शब्द में, एक-एक श्वास में
मानव की एक-एक प्राण की गति में मानव के चित्र अन्तरिक्ष में विराजमान
हो जाते हैं, उनका जो वाहन है वह अग्नि है। एक अग्नि तो यह है जो
सारवत् है । एक अग्नि वह है जिसके ऊपर शब्द विराजमान हो करके
जाते हैं । वह ग्राभन्य’ नाम की अग्नि कहलाती है ।

अग्नि के सहस्रों भेद :
१-दक्षिणाय अग्नि, २-ऋषिकेश अग्नि, ३-इन्द्र अग्नि, ४-प्रतिभा
अग्नि, ५-चक्राणि अग्नि और ६-बुद्धि अग्नि आदि नामक सहस्रों प्रकार की
अग्नियां हैं । भौतिक विज्ञान के समीप भी नहीं जाता। भौतिक विज्ञान
उन गानों को नहीं जान सकता । वेद का ऋषि आगे व्याख्या करता है।
कि एक अग्नि तो वह है जो प्रकाश से यहां तक आने के लिए आती है।
एक अग्नि वह है जिसे वैज्ञानिक अथवा योगी अपने में अनुभव करता है
एक अगन वह है जिसे मानव प्राण द्वारा खींचने लगता है। इनके कणों को
लेकर प्राण के द्वारा ऊर्ध्वगति को मन करता है। आगे चलकर जैसे
अभिनय’ अग्नि है, ऐसी एक-एक अग्नि से अरबों-खरबों धाराओं का जन्म
होता है । इन धाराओं को जानना अग्नि की पूजा करना है ।

(सत्ताईसवां पुष्प ३-३-७६ ई.)

योगी का समरूप एवं आहार :

संकल्प मंत्र से योगी की तपती :
योगी उसे कहा जाता है जो मानव धर्म के दस लक्षणों पर अपना
आधिपत्य कर लेता है। उनके ऊपर अनुसरण करता हुआ अपने जीवन को
३म्’ रूपी धागे में, एक सूत्र में पिरो देता है जो चेतना है । जड़ता को
भागकर वह चेतना का अनुभव करता है तो वह योग निद्रा विजयी वन
“” है, राक्षस बन जाता है 1 वह वनस्पतियों के स्थूल अन्न को त्याग
” है, वह केवल वायू के. अग्नि के तत्वों में जो प्रन्तादि परमाणु रूप में
कर रहा है, उन परमाणुओं को वह अपने में ग्रहण कर लेता है।