जीवन सुखी बने, तथा आनंदित बने । जब मन और प्राण एक स्थली ।
जाकर सुचारू रूप से कार्य करने लगते हैं, तो मानव के शरीर में कोई
नहीं रहता। इसलिए मानसिक चिन्तन ऊंचा होना चाहिए। मन और प्राण
को एक सूत्र में लाने का प्रयास किया जाए। उस प्रयास में हम योग में
रमण करके अपने जीवन को ऊर्ध्वगति में ले जाए। मन और प्राण को
एक सूत्र में लाने से पूर्व शरीर की मानसिक क्रिया योग को होनी चाहिए ।
एक तो यह योग साधारणतया माना जाता है।

४. (विज्ञान-योग :ऊर्ध्वगति में जाने वाला जो योग है, उससे नम्रता
में जाने वाला भी एक योग है जिसे विज्ञान कहते हैं । इसमें मानव परमाण
का मिलान करता है, तथा मिलान करता हुआ उसको एक सूत्र में पिरोता
है। एक सूत्र में पिरोने वाला जब चक्र परमाणु योग में मलान करा देता
है, वह धातु योग है। जब उसका योग सुचारु रूप से ही हो जाता है, तो
वह मानसिक गति के आधार पर लोक-लोकान्तरों को मापना प्रारम्भ कर
देता है, वह भौतिक विज्ञान है। भौतिक विज्ञान ऐसा विज्ञान है, जो मन
और बुद्धि को सुचारु रूप से मापता रहता है। परन्तु वह मापा नहीं जाता।
जब बह परमाणु के मिलान के लिए अग्नि की आभा को जानने का प्रयास
करता है, तो वह परमाणुओं को जानता रहता है। अग्नि को जानकर
प्रग्नि की भारत औरों को जानना प्रारम्भ करता है, तो वह वैज्ञानिक-योग
कहलाता है।

५. आत्मिक योग :-सर्वप्रथम (१) गुड़ा केश (२) उपसेथली,
(३) सेलमुष्टि तथा (४) कृतात नाम की औषधियों का अग्नि में पात
बना कर पान किया जाता है। उससे अन्न की पूति हो जाती है तथा मन
और बुद्धि स्वच्छ बन जाते हैं।

ब्रह्मवेत्ता वही बनता है जो अपने शरीर की आभा को जानता है ।
शारीरिक विज्ञान से, सात्विक ब्रह्म-ज्ञान से कोई भी मानव ब्रह्मवेत्ता नहीं
बन सकता । ब्रह्मवेत्ता वह कहलाता है, जिसका ब्रह्म के द्वारा आदान प्रदान
हो, ब्रह्म के द्वारा गमन हो। यह गमन मन और प्राण के योग के द्वारा
होता है। प्राण की आभा को क्रिया में साधना से लाना है। अासन शुरू
होना चाहिए। एक-एक प्रश्न ढाई-ढाई घड़ी का होना चाहिए।
उस आसन में बैठकर अपनी अन्तरात्मा में उसकी अनुभूति कर सक, तथा

मन और प्राण को एक सूत्र में ला करके आत्मा की प्रतिभा की जान सके ।
फिर प्राणायाम करना चाहिए। इससे मानव शरीर में बौद्धिक, अात्मिक
तथा शारीरिक तीनों प्रकार की उन्नति प्रारम्भ हो जाती है ।

| (अट्ठाईसवें पुष्प १२-१२-७४ ई०)
ऊध्ध गति :-श्रन्तरात्मा का स्वभाव ऊध्र्वगति को जाना है। यदि
इन्द्रियों की भी ऊर्ध्वगति होती है, तो सुख का अनुभव करती है और ध्रुवा
हो जाने पर दु:ख का अनुभव करने लगती है। ऊध्र्वगति ही मानव का
जीवन है, ध्रुवा गति ही मृत्यु है। (तेरहवां पुष्प २२-८-६९ ई०)

जब ब्रह्मचारी ऊर्ध्वगति को प्राप्त होकर उस सुन्दर स्थल रूपी यज्ञ
शाला में रमण करने लगता है, तो वह ऊध्र्वगति से द्यलोक को प्राप्त हो
जाता है। उस काल में उसकी एक आभा का प्रायः सुन्दर दिग्दर्शन होता
है, तो वह प्राचार्य वह ब्रह्मचारी, वह ऋषि ऊर्ध्वगति को प्राप्त होता हुआ,
इस संसार में एक हत्या का, उज्ज्वलता को धारण करता रहता है।

(सत्रहवां पुष्प २५-२-७२ ई०)
ऊर्ध्वगति उसको कहते हैं, जब ब्रह्मारंध्र की नाना प्रकार की
नाड़ियों के द्वारा दिव्य दर्शन कर लेता है। उसे दिव्य चक्षु भी कहते हैं ।

(सत्रहवाँ पुष्प २५-२-७२ ई०)

परमपूज्य ब्रह्मचारी कृष्णदत्त जी महाराज ने महर्षि श्रृंगी के रूप में
किसी जन्म में गुरुवर्य ब्रह्मा जी महाराज से प्रश्न किया :
“योगी दिव्य दृष्टि कैसे प्राप्त कर लेता है ? क्योंकि योगी आत्मा
की प्रवृत्ति सूर्य, ध्रुव, पृथ्वी आदि नाना लोक-लोकान्तरों के गर्भ को जानने
लगती है ?”

गुरुवर्य ब्रह्मा जी महाराज ने उत्तर दिया :
जब योगीजन यौगिक क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, तो जब वे ब्रह्मलोकों
में प्रविष्ट होने लगते हैं, तो आत्मा एक प्रबल शक्ति वाला बन जाता है ।
आसन, प्राणायाम के द्वारा मन और प्राण दोनों के मिलान से ब्रह्मचर्य की
गति ऊर्ध्व बन जाती है। ब्रह्मचर्य की उर्ध्व गति बना करके उसे ब्रह्मरन्ध्र
में ले जाते हैं। उससे ब्रह्मरन्ध्र एक अबाध गति में परिणत होता रहता है ।
उसमें एक महत्ता ऐसे प्रकट होने लगती है जैसे एक महत्ता में मानवीय
जाति में समूह उत्पन्न होता है । ब्रह्मचर्य की गति नाड़ियों के द्वारा ऊध्र्व
बन जाने पर ब्रह्मरन्ध्र से उसका सम्बन्ध हो जाता है।”