बाणी भी उसके साथ कार्य करती है या नहीं ? या उसके जाग्रत होने के
पश्चात् वाणी में कुछ प्रोज आ जाता है, या अात्मिक शक्ति का जागरण
हो जाता है ?
ऋतम्भरा द्वारा परमात्मा से मिलान होने पर योगी के शरीर का रूप :
गुरुवर्य ब्रह्मा जी महाराज ने अनुभव कराते हुए बताया कि जय
ऋतम्भरा से उस परमात्मा में मिलन हो जाता है, उस समय यह प्राट्मा
बहुत विस्तार वाला बन जाता है। जब वह परमात्मा के प्रांगन से अपने
अांगन में आता है, तो ये इन्द्रियां जो शून्य हो चकी थीं, अपना कार्य करने
लगती है। उस समय वाक्यों में, नेत्रों की ज्योति में शुद्धता आ जाती है,
घ्राण सुगन्धि वाली हो जाती है, हस्त भी सुन्दर हो जाते हैं। योगी को
किसी प्रकार की भ्रान्ति नहीं रहती । आत्मा के प्रकाश से इन्द्रियों में परोत
प्रोत होकर वह योगी प्रकृति पर शासन कर लेता है। शासन करते हुए
वड श्वास को भी, जो प्राण कहलाता है, अपने अधीन कर नेता है । उस
समय योगी-आत्मा जल में तथा वायु में रमण कर सकती है। प्राणों पर
सवार होकर वह आत्मा अन्तरिक्ष में उसी प्रकार रमण करने सगता है.
जैसे यन्त्रों से बने पुष्पक विमान पर। (सातवां पुष्प ३-४-६४ ई०)
योगी का पुष्पक विमान का स्वरूप :
कहा जाता है कि पूर्व युगों में ऋषियों के लिए पुष्पक विमान प्राते
थे, उसमें बैठकर वे वैकुण्ठ को चले जाते थे। इसका अभिप्राय यह है कि
जब मानव अपने मन को शान्तिमय कर लेता है, तो ये सब तन्मात्राएं मन
में समाहित हो जाती हैं, यह सारा संसार बुद्ध में समा जाता है, बुद्धि
अन्तःकरण में लय हो जाती है। ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्म न्द्रियों के समस्त
विषय अन्तःकरण में लय हो जाते हैं। इस अन्तःकरण को पुष्पक विमान

कहा जाता है। तथा इस ज्ञान का नाम ”पुष्पवेति-जञान” है ।
हमारा जितना भी मन का विज्ञान है, बुद्धि का विज्ञान है, तन्म
रंगों का विज्ञान है, विज्ञान का विज्ञान है और वाणी का विज्ञान है, वह सब
अन्तःकरण में लय हो जाता है, जो अन्तःकरण ब्रह्मचर्य से परिपक्व है और
प्रपती यीगिकता में डूबा हुआ है ।

इस पुराने मन्त्रों से बने विमान में आत्मा विराजमान हो जाता
है जहां वह जाना चाहता है, पहुंच जाता है । पुष्पक विमान में यह प्रार
बैठता है और परमात्मा इराको चलाता है। इस प्रकार वह व
चला जाता है जहां वह परमात्मा के लिए आत्मिक संसार को प्रत्यक्ष देश
सकता है।
(तीसरा

हमारे यहां योग के सम्बन्ध में नाना प्रकार के भेदन माने गए हैं ।
परन्तु जो मूल है, वह यह है कि जो योगी बनना चाहता है, योग के समीप
जाना चाहता है। परमात्मा के निकट जाना चाहता है, वह अपने ग्राहार
को उज्ज्वल बनाता है।

१. एक शारीरिक योग होता है, जिसमें शारीरिक अथवा मानसिक
रोग समाप्त होते हैं । यह मन नाना स्थलों से नाना प्रकार के अस्वस्थ
भोगों को ला करके शरीर को रुग्ण बना देता है। अतः मानव का सम्पक
ऊर्ध्वगति वाला होना चाहिए। ऐसे प्राणियों से सम्पर्क नहीं रहना चाहिए,
लो मन को सदैव भयभीत करते रहते हों । क्योंकि मन को जिस प्रकार का
बनाना चाहते हो, उसी प्रकार का बना लो । शरीर में जितने रोग होते हैं,
उन सबका मूल कारण यह मन ह है ।

२. वाणी-चित्त-योग :-मन और प्राण दोनों इस शरीर में सुचारु
रूप से कार्य करते रहें, ऐसा भी एक भौतिक योग है जिसे “वाणी-चित्त
योग’, कहते हैं। एकान्त स्थान में विराजमान होकर मन के ऊपर संयम
करना प्रारम्भ करता है । संयम करके एक दूसरे के मन क एक दूसरे के
मन से आच्छादित भी कर देता है । परन्तु यदि मन में किसी प्रकार का
भय नहीं है, रुग्णता नहीं है, तो दूसरे के मन से वह प्रभावित नहीं होता।
इसलिए हम शारीरिक जीवन को सुखी बनाने के लिए, रोगों से दूर रहने
के लिए चिंता से रहित हो जाते हैं । चिन्ताओं से मानव का शरीर एक
अग्नि का समूह बन जाता है । अग्नि का समूह बन करके वह नाना प्रकार
के रोग मानव के हृदय में उत्पन्न कर देता है तथा शरीर व्याधियों का
मन्दिर बन जाता है। अतः मन को ऐसा चिंतित न बनायो जिससे मानव
के शरीर में नाना प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाएं ।

३. ग्रीष्म-योग:-एक योग ऐसा है, जिसमें नाना प्रकार की औषधियों का
पान किया जाता है। हम उन औषधियों का पान करें, जिससे मानव का