हो करके प्रभु के आनंद में बिखरने लगा है । वे कर्म प्रकृति के अ्रांगन में
रमण कर जाते हैं, (उस) आत्मा के समीप नहीं रहते।

(पच्चीसवां पुष्प ११-११-७२ ई०)
मन और प्राण को एक सूत्र में लाने के लिए ब्रह्मचर्य तथा व्रतों का
पालन करना अनिवार्य है। हमें चित्त की विशेष अवस्था को जानने का
प्रयास करना चाहिए। हम उस भ्रमी (भ्रांतिपूर्ण) चित्त की सीमा को
नष्ट करके प्रकाश ही प्रकाश को देखने का प्रयास कर तथा स्वयं प्रकाशमय
बन जाएं।

परमात्मा प्रकाशमय है :
प्रकाशमय बनने का अभिप्राय यह है कि हममें अन्तर्द्वन्द्व नहीं रहना
चाहिए। उसे समाप्त कर देना चाहिए । चित्त नाना रूपों में परिणत होकर
साधारणतया विशेषता तथा यौगिकता में परिणत होता रहता है। आत्मा
परमात्मा के विषय के क्षेत्र में तो प्रकाश ही रहता है, द्वितीय-भाव का
जन्म नहीं होता। द्वितीय भाव का जन्म तो उसी समय होता है जब हम
प्रकृति के नाना आवेशों में ब्रह्म को जागरूक करना चाहते हैं अर्थात् भौतिक
बाद में नाना यंत्रवाद में प्रभु को दृष्टिपात करना चाहते हैं । यदि हम
यह स्वीकार करने लगे कि इससे ब्रह्म प्राप्त हो जाए, तो यह मानवता के
लिए सुन्दर नहीं है। गुरु ब्रह्मा जी महाराज का उपदेश यही रहा कि
संसार में यह मत जानो कि ब्रह्म तथा आत्मा को द्वितीय भावों में व्यक्त
करना है। अपने जीवन में एक महान् तथा ऊंची से ऊंची उड़ान उड़ते चले
जाओ । यह नाना प्रकार की आभा स्वत: ही समाप्त होती रहती है, वह
रहती ही नहीं।
(अठारहवां पुष्प १३-४-७२ ई०)
८-समाधि :-(ध्यान-विशेष, एकाग्रता)
ॐ ब्रह्म को ध्यान में लय हो जाने का नाम समाधि है ।

(अठाईसव पुष्प-पृष्ट-११)
जब ऋषि-मुनि योग-स्थित होते हैं, तो हृदय में अगम्यवत् हो जाते
हैं, प्रान्तिक प्रवृत्तियों को अपने में धारण करने वाले बन जाते हैं।
(पन्द्रहवां पुष्प २०-६-६३ ई०)
जो मानव हृदय और मस्तिष्क का समन्वय करता रहता है तो
सबसे पहले उसे घृणा, कामवासना, अधिक मद, अभिमान तथा अपमान केी
त्यागना होगा। इसको त्यागने के पश्चात् मानव के हृदय तथा मस्ति

दोनों में विशालता आने लगती है। व्यान नाम का प्राण महान् वैज्ञानिक
वार्ता को विचारने लगता है। योगी समाधिस्थ हो जाता है ।

समाधि कई प्रकार की होती है । १=-निविकल्प समाधि वह होती
है जिस में परमात्मा का चिन्तन करते-करते मानव को यह प्रतीत नहीं
होता कि यह जगत् भी कोई जगत् है ।

२-अपरात-सेवन-समाधि :-
अपरात-सतवन-समाधि वह होती है जिससे मानव समाधिस्थ होकर
जड़वत हो जाता है। वह ऐसा जड़वत् हो जाता है कि उसे संसार का बोध
होता ही नहीं, अपने शरीर का बोध भी नहीं रहता।
३-एक समाधि वह होती है, जिसमें प्राण पर प्रात्मा का तारतम्य
स )
लग जाता है। इनको इस प्रकार समझा जा सकता है कि जागरूक अवस्था
प्रव
में आत्मा का सम्बन्ध नेत्रों से होता है। स्वप्नावस्था में आत्मा का सम्बन्ध
मन से होता है तथा सुषुप्तावस्था में आत्मा का सम्बन्ध प्राण से रहता
है। इसमें यह आत्मा प्राण के द्वारा गमन करता रहता है और जीवन का
सर्व व्यापार शान्त हो जाता है। इस प्रकार से ये तोन समाधियां हैं।

१-निर्विकल्प समाधि जागरूकता के समान है।
२-अपरात सतवन समाधि-स्वप्नवस्था के समान है।

इसमें ब्रह्माण्ड का विस्तार रूप धारण करना । जैसे स्वप्न में
मानव उन परिस्थितियों तथा द्रव्यादि को देखता है, जो उसके पास कभी
नहीं होती, एक नवीन रचना होने लगती है ।

३-तृतीय समाधि में मानव परमात्मा को व्यापक रूप में दृष्टिपात
करता है, जिसको साम्य दृष्टि कहते हैं। जब वह एक ही प्रभु की चेतना
को सव जगत् में दृष्टिपात करने लगता है, तो उसके द्वारा पाप-पुण्य भी
नहीं होता। आत्मा का सम्बन्ध केवल प्राण से रहता है।

इसके अतिरिक्त ४-चेतनित समाधि, ५-लोकेश समाधि आदि नाना
प्रकार की समाधियां होती हैं । (चौदहवां पुष्प २-११-७० ई०)
परमपूज्य ब्रह्मचारी कृष्णदत्त जी महाराज जब श्रृंगी के रूप में थे,
तब के वासी जन्म
में, इन्होंने अपने गुरुवर ब्रह्मा जी महाराज से प्रश्न
* कि जिस समय यह आत्मा प्रभु का अनुभव करता है, उस समय यह