प्राचार्य आदि का निर्णय कराता है । वेदों का भी चार विभागों में विभा-
जन कर देता है। धारणा नाम उसी को कहा है, जब पुनः से संसार
एक प्रीत करके मन में प्राण का मिलान हो जाता है। प्रकृति का प्रत
जगत् मन की रचना है क्योंकि मन प्रकृति का है
| मन को प्राण में पुनः से परिणत करने के लिए, स्थिर रह्कर शन,
शनैः अभ्यास करें। उस समय मन शरीर प्राण वनों की अवस्था चित्त में
चली जाती है। चित्त में प्रकृति और मन की सीमा समाप्त हो जाती है।
इसी अवस्था को मुक्ति कहा जाता है । अर्थात् मन श्री प्राण दोनों के
मिलान होने का नाम ही मुक्ति है ।

मन और प्राण के विभाजन होने का नाम ही चित्त है। चित्त में
संरकार बनते हैं, संस्कारों से यह संसार और जगत् बन जाता है। यह
जंग एक वक्ष के समान वन जाता है। इस वक्ष के बन जाने के पश्चात
आत्मा और परमात्मा का विषय चित्त की सीमा में आने से यह संसार
भ्रान्तिसय बन जाता है। ब्रह्म से भी मानव का विच्छेद होने लगता है।
कहीं-कहीं तो आत्मा और ब्रह्म की सत्ता को स्वीकार करना भी उसके लिए
अवांछनीय हो जाता है। कहीं इस भोगवाद को स्वीकार करने लगता है
लथा इसो को जीवन समझने लगता है। परन्तु वास्तविकता ऐसी नहीं;
यह तो जगत् में ही माना गया है।
जगत् में हमारे आने का उद्देश्य यही है कि इस संसार में संस्कारों
को एकाग्र करके धारणा, ध्यान, समाधि में प्रविष्ट होवे तथा चित्त की
सीमा का नष्ट कर दें ।
चित्त के नाना रूप :
चित्त भी कई प्रकार के माने गए हैं जैसे अन्तरिक्ष भी चित्त माना
गया है। मानव के मन की भीण दशा का नाम भी चित्त है। महर्षि
शाण्डिल्य, महर्षि दधीचि आदि ऋषियों का मत है कि संसार में ‘इ’ में
अग्नि प्रविष्ट रहती है। अात्मिक-यज्ञ करने समय प्रात्मा के पृत को
द्युमण्डल से ही लिया जाता है ।

प्रश्न यह है कि वह मंडल कौन-सा है जहां गो पृत रहता है ।
‘गो’ नाम प्राण मा है जिसको मन के द्वार कहा जाता है। उसमें से जो
तरंग उत्पन्न होती है, उसका नाम भूत है । उन तरंगों को जब हृदय रूपी
यज्ञ में प्रति दी जाती है तो जैसे यज्ञशाला में (यज्ञ कुण्ड में) समिधा

समिधा न रह करके अग्नि रूप बन जाती है, इसी प्रकार चित्त की सीमा
न रह करके एक ब्रह्म ही ब्रह्म मानव को अपने में दृष्टिपात आने लगता
। तथ प्रकाश ही प्रकाश रह जाता है, अंधेरा नहीं रहता । अात्मा
परमात्मा की नाना प्रकार की सीमाएं तथा नाना प्रकार के वाद मानव क
मस्तिष्क से समाप्त हो जाते हैं।
यह विवाद तभी तक रहता है, जब तक चित्त की सीमा घनी रहती
है और मन तथा प्राण दोनों की सहकारिता नहीं होती ।
आध्यात्मिक यज्ञ :
मन और प्राण दोनों का मिलान करने के पश्चात् द्यु से घृत लिया,
चित्त रूपी यज्ञशाला में नाना प्रकार की भ्रांन्तियों रूपी समिधा को ब्रह्म
रूपी अरे में प्रविष्ट किया। इस प्रकार भ्रांन्तियां समाप्त हो जाती हैं
खया ब्रह्म एक प्रकार का प्रकाश रूप में दृष्टिपात प्राणी लगता है, अन्धकार
नहीं रह पाता है ।

किन्तु सावधानी यही रखनी है कि मन और प्राण का विभाजन न
होने पाए । विभाजन होते ही यह संसार प्रपंच (संसार का जंजाल, भ्रम,
घोड़ा) बन जाएगा। मिलान होने पर संसार से उदासीन होकर धारणा
ध्यान, समाधि में प्रविष्ट हो जाएंगे (अठारहवां पुष्प १३-४-७२ ई०)

मन और प्राण े समन्वय का परिणाम :
मन और प्राण का मिलान हो जाना ही इस शरीर में आनन्द प्राप्त
करना है। मानव को मन और प्राण की प्रक्रिया का अभ्यास हो जाने पर
वह निद्रा-विहीन जीवन में रमण करने लगता है। उसको निद्रा की आवश्य
कता नहीं रहती । क्योंकि मन-प्राण का मिलान होने पर प्रकृति के आवेशों
का अधिकार समाप्त हो जाता है। विभाजनवाद न होने से प्रमाद भी नहीं
रहता । प्रमाद उसी काल में आता है जब हमारी प्रवृत्तियों का विभाजन
हो जाता है। मन और प्राण का विभाजन होने से प्रवृत्तियों का विभाजन
हा जाता है। मन और प्राण के एक सूत्र में बंध जाने पर चित्त के नाना
संस्कारों का भी कुछ न कुछ रूप परिवर्तन हो जाता है। उनमें हलकापन

धाकड आचार्य गति हो जाती है। मन और प्राण की अग्नि प्रदीप्त होने पर
चित्त के संस्कार और भी सूक्ष्म हो जाते हैं और अग्नि प्रदीप्त करने पर
प्र
सूक्म बनते हैं। परिणाम यह है कि सूक्ष्म से सुक्ष्म वनकर कारण में
नात हैं। कारण में जाकर एक समय ऐसा प्राणी है, जब प्रात्मा निद्दृन्द्व