इतिहास शब्द(ithasik sand)par3

आदि के कारण किसी अन्य स्थान से आई हुई हैं।
कैर ग्राम से मिली मुद्राओं को पढ़ने की इच्छा हुई, परन्तु कोई बताने वाला नहीं था। विवा
मथुरा संग्रहालय के निदेशक के पास गये और उन्हें सिर दिखाकर कहा कि इनको पढ़कर बताने
कीजिए। उन्होंने बताया कि ये सामन्तदेव की मुद्रायें हैं। इसी प्रकार आचार्य जी अन्य मुद्राओं को लेक
बार मथुरा गए तो निदेशक महोदय ने परामर्श दिया कि आप इस तरह बार-बार यहां आकर परेशान
सिक्कों की पुस्तकें बाजार में मिलती हैं, उनसे चित्र देखकर आप स्वयं पढ़ने का अभ्यास करें तथा ।
भारतीय लिपिमाला नामक पुस्तक गौरीशंकर हीराचन्द ओझा की लिखी मिलती है। उसकी सहायता से
लिपियों को पढ़ने का अभ्यास कीजिये। इसके पात्र तो आचार्य जी अविराम गति से सिके और ग्रंथ संग
जुट गये। इसी अवधि में भूमि में दबे हुये प्राचीन खण्डहरों की भी जानकारी होती गई और वहां से भी ।
बर्तन, सिके, मूर्ति आदि जो कुछ भी टूटा, फूटा, आधा, पूरा मिलता गया, उसे ही संग्रहित करते गये। उसे
प्रयास का यह परिणाम हुआ कि गुरुकुल में एक पुरातत्व संग्रहालय स्थापित करने का विधिपूर्वक शभारओ

हुआ।
कछ समयोपरान्त जब इन सिक्कों को पढ़ा गया तो पता चला कि ये सिके तो आज से लगभग ग्यारह
सौ वर्ष पुराने अर्थात् ९वीं शती के आर्य राजा श्री सामन्तदेव के हैं।
कुछ दिन पश्चात ग्राम सीदीपुर लोवा (झज्जर) में भवन निर्माण के लिए नींव खोदते हुये मिट्टी के एक
बर्तन में तांबे के कुछ सिक्के निकले। इन्हीं मुद्राओं में से कुछ मुद्रा श्री माननीय पण्डित ब्रह्मदेव जी ने लाकर श्री
आचार्य जी को भेंट की। मुद्राओं के अध्ययन से ज्ञात हुआ कि ये मुद्रायें तो लगभग दो हजार वर्ष पुरानी हैं तथा
यौधेय गण एवं अन्तिम कुषाण राजा वासुदेव की हैं। ठीक इसी ढंग के कछ सिक्के श्री महाशय मामचन्द जी
आंवली (सोनीपत) निवासी ने भी दिये। इनमें जो यौधेय गण के सिक्के हैं उन पर ब्राह्मी लिपि एवं संस्कृत भाषा
में ”यौधेय गणस्य जय लेख अंकित है।
२७ फरवरी १९६० ई० को श्री माननीय मास्टर भरत सिंह जी, बामला (भिवानी) ने हरयाणा के प्रसिद्ध
प्राचीन ध्वस्त दुर्ग नौरंगाबाद से प्राप्त यौधेयों की ‘यौधेय नां बहुधान्यक’ लेख वाली दुर्लभ मुद्राओं के सांचे श्री
पुज्य स्वामी नित्यानन्द जी के हाथ भेजे। ज्यों ही सांचे श्री स्वामी जी ने आचार्य जी को दिये, श्री आचार्य जी को
अपार हर्ष हुआ और वे तत्काल अपनी जीप गाड़ी द्वारा वहां पहुँच गये तथा वहां से कुछ और भी सांचे प्राप्त किये।
कुछ दिन पश्चात फिर श्री मास्टर भरत सिंह जी ने इसी दुर्ग की ब्राह्मी लिपि में लिखे लेख युक्त मिट्टी की एक बहुत
महत्वपूर्ण मोहर भेजी, जिस पर यौधेय जनपद का नाम भी लिखा है। इस मोहर का विस्तार से वर्णन तथा चित्र श्री
पूज्य आचार्य जी द्वारा लिखित ‘वीर भूमि हरियाणा” पुस्तक में दिया जा चुका है।
इतना सब प्राप्त होने पर श्री आचार्य जी का यह दृढ़ निश्चय हो गया कि हरयाणा प्रान्त से पुरातत्वीय
सामग्री. और प्रचुर मात्रा में मिलेगी। फिर क्या था! वे इस कार्य में जट गये। जैसा कि उनका स्वभाव
थावे जिधर भी लगते थे, उधर ही अपनी पूरी शक्ति झोंक देते थे, इस कार्य में भी उन्होंने हरयाणा के अनेक
खेड़ा से पर्याप्त ऐतिहा सामग्री एकत्र कर ली।