इतिहास शब्द(ithasik sand)

Part2

जी आचार्य जी के इतिहास विषय में रुचि पैत्रिक दायाद के रूप में मिली है। इनके पिता चौधरो
जो इतिहास में विशेष रुचि रखते थे, उन्हीं के संग्रहित ग्रन्थों को पढ़-पढ़कर इनकी रुचि भी इस

होती चली गई।
मनोज जंगल के एकान्त शान्त वातावरण के बीच स्थित गुरुकुल जैसी पावन संस्था में जहा
क एवं राष्ट्रीय विचार धाराओं के रहते हुये आध्यात्मिक चर्चा ही श्रेयस्कर और सर्वोत्कृष्ट समझी जाती
इरा ट्रय स्तर पर संग्रहालय का निर्माण केवल मात्र श्री आचार्य जी के इतिहास प्रेम का ही फल है।
काल से ही श्री आचार्य जी इतिहास के अध्ययन और लेखन में रुचि लेते रहे हैं।इतिहास लेखन में
दटदिकता का स्मरण करने तथा सर्वसाधारण जनता में इतिहास के प्रति रुचि पैदा करने में पुरातत्त्व
तको उपादेयता से भी आप प्रारम्भ से ही खुव परिचित थे। इन्होंने स्वयं भी अनेक बड़े बड़े संग्रहालय
थे और उनकी सार्थकता का अध्ययन भी किया। इनके मन में भी पुरातत्व संग्रहालय निर्माण की इच्छा थी।
इतना होते हुये भी श्री आचार्य जी ने कदापि यह नहीं विचारा था कि हमारे द्वारा भी किसी संग्रहालय का
दमोह सकेगा ।साथ ही यह भी विचार थे कि हरयाणे जैसे बंजड़ प्रदेश में कहां पुराने सिक्के? और कहां
= समग्र जिसको पुरातत्वीय सामग्री कहा जा सके ? पुनरपि इतिहास के ग्रन्थों में भारतीय प्राचीन सिक्कों
द्र) का वर्णन पड़ते-पढ़ते इनके मन में बार-बार यह विचार उत्पन्न होने लगा कि जहां मैं इस समय
ककर्य कर रहा हैं, इस हरयाणा प्रान्त में भी प्राचीन सिक्के मिल सकते हैं अथवा नहीं?
सन् १९५९ में एक विलक्षण घटना घटी। उन दिनों आचार्य जी स्कूल तथा कॉलेजों में ब्रह्मचर्य आदि
वदों पर व्याख्यान दिया करते थे। दिल्ली के कैर ग्राम के हाईस्कूल में ये इतिहास विषय में भाषण दे रहे थे कि
प्राचीन सिक्कों की खोज करनी चाहिये। भाषण के पश्चात् एक छात्र इनके पास आया और कहा कि हमारे
इ कुछ पुराने सिक्के रखे हैं। मकान के लिए नींव खोदते समय एक हांडी में मिले थे, कुछ तो वर्तन वालों की
इन पर बेच दिये, ५-७ सिके रखे हैं। उस स्कूल के प्रधानाचार्य श्री होश्यारसिंह आर्य बाजीतपुर (दिल्ली)
दो थे। उन्होंने उस विद्यार्थी को उसी समय घर पर भेजा और कहा कि वह सिक्के लाकर दिखाये। वह
के लाया और आचार्य जी को दे दिये। उस समय इनकी प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं रहा। वहीं से आगे
३ वेषण का मार्ग मिला और रोहतक, भिवानी, दादरी, हांसी, हिसार, रेवाड़ी, जगाधरी, हापुड़ और
दबाद आदि बर्तन बेचने वाले नगरों में जाकर बर्तनों के दुकानदारों से मुद्रायें खरीदने लगे।
यहाँ से इस पुरातत्त्व संग्रहालय का शुभारम्भ समझना चाहिये। किसको पता था कि ये टके के समान
दिलवालो जर्जर किन्तु अत्यन्त महत्वपूर्ण मुद्रायें (सिक्के) आगे चलकर सैकड़ों नहीं हजारों की संख्या में
रायगी और एक विशाल संग्रहालय को जन्म देंगी। यह अनुमान भी नहीं था, अतः बेचने वालों ने किसी
इनकी प्राप्ति स्थान एवं प्राप्ति तिथि आदि आवश्यक विवरण भी नहीं लिखा जो संग्रहालय और खोज व
लिखा जाना अत्यन्त आवश्यक है।यद्यपि मुद्रा आदि की प्राप्ति का निश्चित स्थान के ज्ञान हुये विना ॥
बहुत महत्व की बात है। किन्तु इतिहास में मुद्रा के उपलब्धि स्थान का पता होना उसकी महत्ता क
त कर देता है। प्राप्ति स्थान से यह ज्ञात होजाता है इस शासक का यहां शासन था, या ये मुद्रा व्याप