इतिहास शब्द तीन शब्दों से मिलकर बना है इतिहास भूतकाल इस प्रकार का था
(हम जो कह रहे हैं, वह) निश्चय से ऐसा ही था उस भूत को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर देने का नाम ही इतिहास
है। अत: कल्पना से लिखा गया वर्णन सत्य इतिहास नहीं हो सकता। इतिहास के माध्यम से ही
समाज तथा राष्ट्र क विगत स्वरूप के दर्शन साकार किये जा सकते हैं। वर्तमान का आधार हनि
है। इतिहास न केवल वर्तमान को अपितु भविष्य को भी नियन्त्रित करता है।
भारतीय प्राचीन लोगों को संस्कृति और सभ्यता कैसी थी, उनकी किस अद्भुत सूझ-बूझ ने देश को
उन्नति के शिखर तक पहुंचाया तथा किस भूल के कारण रा्टर को घोर विपदाओं का सामना करना पड़ा इत्यादि
तथ्यों की निश्चित जानकारी हमें इतिहास के माध्यम से ही हो सकती है। इसके लिए अन्य कोई साधन नहीं है।
जाति अथवा देश अपने इतिहास को भूल जाते हैं वे मुर्दा हो जाते हैं। अत: इतिहास को सुरक्षित रखने का

यत्र करना चाहिए।
गुरुकुल झझर ने जहां अन्य क्षेत्रों में राष्ट्र की सेवा की है वहां इतिहास के क्षेत्र में भी अविस्मरणीय
योगदान दिया है। यह गुरुकुल का यह योगदान तीन रूपों में है- 1. पुरातत्त्व संग्रहालय के रूप में, 2. इतिहास
विषयक सामग्री के प्रकाशन के रूप में तथा 3. ताम्रपत्रों के रूप में।

पुरातत्व संग्रहालय के रूप में
इतिहास की रचना पुरातत्व पक्षियों के बिना असम्भव है। पुरातत्व साक्ष्यों के द्वारा भारत के प्रचलित
प्राचीन इतिहास का वर्तमान रूप में हमारे सम्मुख लाने का श्रेय अलक्जैण्डर कानिंघम, रोडजर प्रिंसेप, व्हाईट
हेड, सर विलियम जोन्स और एलन आदि योरोपियन विद्वानों को है। सुदुर योरोप से भारत में आकर भारतीय
पुरातन खण्डहरों और ऐतिहासिक महत्व के टोला से जो कुछ प्राप्त किया, उसे उन लोगों ने संसार के सम्मुख
रखा और अपने निजी विचारों के अनुसार उसको इतिहास का रूप दिया। जब सहज स्वभाव से प्रास वस्तुओं
से भारतीय प्राचीन संस्कृति, सभ्यता की गरिमा झलकती दिखाई देने लगी तो उनके कुछ अनुयायियों ने अपने
निराधार कल्पना तथा धर्तता के कारण भारतीय इतिहास के तथ्यों को तोड मरोड कर उपस्थित करने का महात
और सफल प्रयास किया। परिणामस्वरूप भारतीय जनमानस हीन भावना से ग्रस्त होता चला गया और प्रचित
भारतीय साहित्य में वर्णित भारत के गौरव को काल्पनिक मानने लग गया। ऐसे भारतीय जनमानस को भारत
का सही स्वरूप दिखाने के लिए नये सिरे से सच्चे इतिहास की रचना की आवश्यकता है। इसीलिये पुरातत्व
के
द्वारा प्राचीन भारतीय इतिहास की सामग्री संग्रह करने तथा सत्य इतिहास लिखने के लिये आचार्य भग
(स्वामी ओमानन्द) जी के मन में गुरुकुल में पुरातत्व संग्रहालय की स्थापना का विचार उत्पन्न