धर्मपाल विद्यालंकार(drampal vdalnkar)

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अत्यधिक प्रसन्नता है कि गुरुकुल झज्जर महाविद्यालय अपने उज्ज्वल इतिहास के सौ वर्ष पूरा का
है। इतना लम्बा समय किसी भी व्यक्ति, संस्था और राष्ट्र के उन्नयन के लिये एक विशाल झरोखा है। इस गुरुदुल
के गरिमापूर्ण शतक का विहंगम अवलोकन और विश्लेषण इसके गौरवमय इतिवृत्त को अलोकित कर रहा है।
इस अवधि में इस गुरुकुल ने देश-विदेश में भारतीय संस्कृति, सभ्यता, सदाचार, संस्कृत भाषा की उन्नति, प्राचीन
भारतीय इतिहास का शोध, आयुर्वेद के द्वारा जन-सामान्य की सेवा, गोवंश की सेवा तथा संस्कृत हिन्दी भाषा के
साहित्य प्रकाशन में अपना अभूतपूर्व योगदान दिया है। साथ ही इसने जनता में फैली अनेक कुरीतियों को दूर करने
और नवयुवकों को प्रेरणा देने के लिए महनीय उद्योग किया है।
आर्षपाठविधि का यह गुरुकुल महर्षि दयानन्द जी द्वारा प्रतिपादित शिक्षा पद्धति और स्वामी ओमानन्द
जी (पूर्व नाम- आचार्य भगवान देव) का प्रकाश स्तम्भ है। उन्हीं की प्रेरणा से इनके अनेक शिष्य देश के अनेक
प्रान्तों में इसी शिक्षा पद्धति का अनुसरण कर बहुत सारे गुरुकुल चला रहे हैं। पूज्य स्वामी जी द्वारा यहां स्थापित
पुरातत्व संग्रहालय भी देशी विदेशी शोधकर्ताओं के आकर्षण का केन्द्र है। इस महती संस्था को वर्तमान में
सम्भालने और आगे बढ़ाने में आचार्य विजयपाल जी एवं संग्रहालय में संग्रहण और शोध कार्य का संरक्षण आचार्य
विरजानन्द जी भलीभांति कर रहे हैं। मैं इन विद्वानों को साधुवाद देता हूँ। मेरा पूरा विश्वास है कि इनके संरक्षण में
यह संस्था प्रगति के पथ पर सदा अग्रसर रहेगी। मैं यहां यदि आदरणीय फतेहसिंह जी भण्डारी के योगदान का
स्मरण व आभार व्यक्त नहीं करूं तो उनको प्रशंसनीय सेवाओं की उपेक्षा होगी। गुरुकुल में सबसे लम्बे समय तक
रहने और गुरुकुल की अहर्निश सेवा में लगे रहने के लिये उनका जितना सम्मान किया जाये वह थोड़ाहै। इस
अवसर पर मैं प्रबंधक सभा के प्रधान श्री चौ० पूर्णसिंह जी देशवाल को भी बधाई देता हैं जिनके कार्यकाल में
शताब्दी समारोह मनाया जा रहा है। इस सन्देश के साथ मे गुरुकुल में सेवारत अनेक प्रकल्पों के लिए आगे भी
सेवारत रहने और पूर्व की भांति आगे भी अग्रसर रहने के लिए अपने अन्तस की समस्त गहराइयों से शभकामना
देता हूँ।

ऋषि दयानन्द ने आर्ष शिक्षा प्रणाली के आधार पर गुरुकुल परम्परा का पुनरुद्धार इस लिये किया था कि
के द्वारा भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों के ज्ञान विज्ञान का प्रकाश पुनः उजागर हो, वेदों की विद्या भारत को
खेन-विश्वगरु के आसनपीठ पर विराजमान करें और लार्ड मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति का उन्मूलन को
ह भारतीयों को मानसिक और बौद्धिक रूप से पूर्णतः अपनी अंग्रेजियत का दास बनाकर ब्रिटिश सामान्य की
नव दृढ़ और स्थायी करने के उददेश्य से परिचित की गई थी। ऋषि दयानन्द के बाद गुरुकुल शिक्षा प्रणाली का
बीडा स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज ने उठाया जिनके कुशल नेतृत्व पूर्ण मार्गदर्शन में अनेक गुरुकुलों की स्थापना
हुई गुरुकुल झज्जर (हरयाणा) भी उन्हीं में से एक है जिसकी स्थापना सन् १९१६ में की गई।अत: अब शताब्दी
समारोह मना रहे हैं।

गुरुकुल झज्जर ने अपनी इस १०० वर्ष की अवधि में अनेक सफलताओं और उन्नतियों की गगन चुम्वी
ऊंचाइयों को छुआ है। विद्या के क्षेत्र में गुरुकुल ने अनेक यशस्वी स्नातकों को पैदा किया है। जिन्होंने अपना
कीर्तिमान स्थापित करके गुरुकुल का नाम ऊंचा किया है। अनेक स्नातक विद्यालयों, महाविद्यालयों और
विश्वविद्यालयों में उच्चतम पदों पर पहुंचे हैं और शिक्षा के क्षेत्र में गुरुकुल झज्जर का नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज
करवाया है। कई स्रातकों ने नैष्ठिक ब्रह्मचर्य से सीधे संन्यास की दीक्षा लेकर अपना जीवन समाज सेवा में लगाया
है और अनेक नये गुरुकुलों की समूचे भारत भर में स्थापना की जो आज सूर्य की भाँति देदीप्यमान होकर विद्या,
शिक्षा और समाज सेवा के अनेक क्षेत्रों में ख्याति अर्जित कर रहे हैं। गुरुकुल झज्जर अभावग्रस्त और पिछड़े वर्ग के
बच्चों को नि:शुल्क अपने यहां प्रवेश देकर उनको प्रबुद्ध और योग्य नागरिक बनाता है जो अपने जीवन को
सफलतापूर्वक प्रगति के पथ पर आगे ले जाते हैं। गुरुकुल ने लेखनी और वाणी द्वारा समाजसेवा का कार्य करने
वाले विश्वस्तर के विद्वान् पैदा किए हैं जो राष्ट्र के सुधार और उत्थान तथा कल्याणकारी कार्य करते हुवे अज्ञान
अन्धकार मिटाने वाले प्रकाश स्तम्भ माने जाते हैं। ऋषि दयान्द की उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा और
आर्य समाज की उच्चतम सभाओं को सम्भालने वाले भी गुरुकुल के ही स्नातक हैं। गुरुकुल की सेवा का आजोबन
व्रत लेकर वर्तमान आचार्य भी गुरुकुल के ही स्नातक हैं। राजनीति के क्षेत्र में भी गुरुकुल ने भारतीय संस्कृति
सभ्यता, आचार-व्यवहार, गोरक्षा, सामाजिक आन्दोलन, आयुर्वेदिक चिकित्सा, प्राचीन भारत के इतिहास के
खोज, संस्कृत और हिन्दी भाषा का प्रचार तथा प्राचीन भारतीय साहित्य का प्रकाशन और प्रचार आदि अनेक क्षेत्र
में अद्भुत सेवा कार्य किया है। मुझे भी ऋषि दयानन्द और ईश्वर की अनुकम्पा के कारण ऐसी गौरवमय संस्था क
स्नातक बनने का सौभाग्य प्राप्त है।

प्रभ करे, गुरुकुल झज्जर अपनी उसी नि:शुल्क प्राचीन आर्ष शिक्षा को अक्षुण्ण बनाये रखे। गुरुकुल क
दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति की कामना करता हुआ।