धर्मपाल विद्यालंकार(drampal vdalnkar)

part3

== > भवन म- हये हम अपने देश को गुज समझते हैं। छात्र भी अध्यापक
_-मेंट ऍट रहते हैं। हमारे देश के विदिशा शहर से पसीना नहीं निकालना चाहते। जो व्यनि
होता है उसका ज्ञान भी उम्भ लेने लग जाता है। पढेलवे लोग गाँव से शहरों में चले जाते हैं
व उजड़ जाते है। समाज के लिए भार मत बनो, भार को कम करने वाले बनो।शरीर के कार्य में पढ
की तरह पुरुषार्थ करो। पुरुष का गुण पुरुषार्थ करन है पुरुषार्थ होन मनुष्य नपुंसक के समान है। १४७.१९६४
को पं० उदयवीर जी शास्त्री गाजियाबाद से पधारे।
| १९६४ को मुनिदेव राज विद्यावाचस्पति का जन्मदिन मनाया गया। २३.१२.१९६३ को स्वामी

श्रद्धानन्द जी का बलिदान दिवस मनाया।

११ जनवरी १९६४ को स्वामी ब्रह्ममुनि जी ने गुरुकुल में आकर उपदेश दिया-माता-धार्मिकी। पिता
सामाजिक। गुरु-अर्यात्मिक। राष्ट्र-धार्मिक, समाज-सामाजिक, स्वयं-आध्यात्मिक। इनक उपेदश निरन्तर
२१ जनवरी तक होते रहे । १४ जनवरी १९६४ को श्री रणवीरसिंह, अनेक सिख तथा गोशाला के अधिकारी
पधारे ।
१० फरवरी १९६४ को महात्मा आनन्द भिक्षु जी पधारे और उनका उपदेश हुआ।

उन्होंने कहा मेरे गुरु स्वामी सर्वदानन्द जो कहा करते थे-‘समय की परीक्षा का जिसको है
ज्ञान, वही व्यक्ति बनता है सबसे महान।” अतः आप समय का सदुपयोग करना सीखें।
। ८ जून १९६४ को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से प्रो.डॉ. तुलसीरामजी पधारे उन्होंने अपनी इंग्लैंड, जर्मनी और
यूरोप के अन्य देशों की यात्रा के अनुभव सुनाते हुए ब्रह्मचारियों को उपदेश दिया।

१८ अगस्त १९६४ को गुरूकुल कांगडी संग्रहालय के निदेशक डॉ. हरिदत्त जी वेदालंकार पधारे १९
तारीख को उनका उपदेश हुआ। भारतीय इतिहास और पुरातत्व का महत्व ब्रह्मचारियों को बताया।
१ नवम्बर १९६४ को श्री पृथ्वीसिंह मेहता इतिहासकार गुरुकुल में पधारे और उनका उपदेश कराया।
इन्होंने भी इतिहास का महत्व बताया।

१२ दिसम्बर १९६४ को आचार्य भगवान देव जी ने अपनी लखनऊ, गोरखपुर और कुशीनगर की यात्रा के
अनुभव बताकर स्वामी आत्मानन्दजी का निर्वाण दिवस मनाया। इस अवसर पर स्वामी आत्मानन्द जी के
शिष्य वेदानन्द वेदवागीश ओमप्रकाश सिद्धान्त शिरोमणि, इन्द्रदेव मेधार्थी स्वामी और ब्र. देवव्रत जी के उप

हुए।
१७ जनवरी १९ ५ को सिमडेगा (बिहार) से ब्र. हरिशरण जी आचार्य जी के साथ

उनका उपदेश हुआ। उन्होंने बताया कि ईसाई अपने मत का प्रचार किस तरह करते है।
हैं।
२२ मार्च १९६५ को ठाकुर अमर सिंह शास्त्रार्थ महारथी पधारे । २३ तारीख को *आयों का मूलस्थान ‘
विषय पर उनका भाषण हआ। उन्होंने कहा-आर्यों का मूल और आदि स्थान आर्यावर्त – भारत है । आर्य कहीं
बाहर से नहीं आया। अंग्रेजों ने यह शांत धारणा फैलाई है कि आर् ईरान से भारत में आये।