धर्मपाल विद्यालंकार(drampal vdalnkar)

Part2

बादल को घटाओं की तरह धार्मिक मनुष्यों पर परीक्षा लेने के लिए आपत्तिया अत है
सजन सिह के पुत्र फतेह सिंह थे। वे अभिमानी थे। उनके दीवान श्यामजी कृष्ण वंमा थ द में
श्यामलदास ने कविता बनाई कि अंग्रेजों के आगे सिर नवाने जा रहे हैं। फतहसिंह इस कविता हो
अंग्रेजी दरबार में न जाकर रोगी होने का बहाना बनाकर रास्ते से वापिस लौट आय। आत्र विद
दशों इन्द्रियों पर विजय पाने का संकल्प लें। छोटे छोटे स्वाथों को छोड़ देना चाहिये। हमें मदद।
पढना चाहिये। देश के लिए मर मिटने की भावना होनी चाहिये।
११ अक्टूबर १९६३ को श्री कपिल देव शास्त्री महेशजी और आचार्य विष्णुमित्र जी गुरुकुल भेंम्टजर

पधारे। आचार्य विष्णु मित्र जी ने कहा- ब्रह्मचर्य। यदि आपके किसी कार्य से आपके चयं
पहुंचती है तो वह कार्य आपको ले बैठेगा। उद्देश्यविहीन जीवन बेकार है। विना उद्देश्य के शिय प्रद।
जाते हैं। शिष्यों को आलसी प्रमादी नहीं होना चाहिये। शिक्षा को दबाव न समझे। अपना टरिन्।
स्मरण करो। जितनी ऊंची शिक्षा हो उतना ही ऊंचा चरित्र भी होना चाहिये। संस्था में आन्तरिक कलह
न हो, क्योंकि यह कलह संस्था का नाश कर देता है।
| पं महेश जी ने कहा पहली पोती आर्य समाज के प्रति आस्थावान् थी, परत्तु तीसरी पद में अन्य।
बिल्कुल हट जायेगी। यह अच्छा लक्षण नहीं है।
१९ अक्टूबर १९६३ को दिल्ली से श्री घनश्याम सिंह गुप्त, लाला हंसराज और रामनाळ भर गरकन।
पधारे। सभी ने गुरुकुल के ब्रह्मवारियों को उपदेश दिया।
३ नवम्बर १९६३ को गुरुकुल में प्रो० शेरसिंह जी के साथ अमेरिकी दूतावास से श्री शैल पवार
शेर ने कहा मुझे भारत में आये हुए दो वर्ष हो गये हैं यह पहला अवसर है, जब मैने किसी गुस्कुल कोदेत
है। यहां मैं ने सब प्रकार की नवीनता देखी। मेरा यह नया अनुभव है। आपके अनुशासन को देना है।
प्रभावित हैं। ऐसा अनुशासन दूसरी जगह नहीं देखा। मेरे देश में शिक्षा के प्रेमी हैं। आप उनके नि
बनेंगे। मैं चाहता हूं मर बाद भी अमेरिकन लोग गुरुकुल को देखें वे केवत शहर को ही देखते हैं।
भारत की ठीक-ठीक झांकी नहीं मिलती। शहरों में पश्चिमी सभ्यता है। परन्तु यहां भारतीय सभ्य

आपका आभारी हूं जो ऐसा अवसर मिला कि भारतीय संस्कृति सभ्यता को निकट से देख पाया है।

१९.११.१९६३ को ब्रह्मचारी बलदेव नैष्ठिक गुरुकुल शुक्रताल से पथारे । उन्होंने २६ नय
व्यायाम, प्राणायाम, ब्रह्मचर्य की महता पर तथा ब्रह्मचारियों के उत्साह वर्धन हेत नित्यति ठप
८.१०.१९६३ को आचार्य भगवान देव जी ने कहा आज में अपने देश में एक भयंका टोपी
में देख रहा हं। पढा लिखा मनुष्य शरीर से काम नहीं करना चाहता। इसमें अपना अपमान मम
को वह मृख् समझता है। हमार देश में हाथ से काम करने से घृणा है, विशेषकर पटित समाज में। हाथसे काम
करने वालों को कमीणा-कर्महीन नहीं मानना चाहिये। जर्मन की औरतों ने अपने बयान का
बनाकर सैनिकों के पास भेज दिये थे। वहां के युद्ों ने अपना घी दूध यन्द करके सेना के लिये में