धर्मपाल विद्यालंकार और पं० सत्यदेव विद्यालंकार गुरुकुल में पधारे। पं० सत्यव्रत जी ने कहा-गुरुकु
प्रणाली खास विचारों की दिशा है। आप का जीवन अध्यात्मवादी है। भारत अपनी विचारधारा के कारण्-
जीवित है। संसार की अन्तिम भलाई अध्यात्मवाद और त्याग के रास्ते में है। अर्थदासता संसार की एक बिमार

है।
हैं।
वोटर जी ने कहा सभा में सीधे बैठने की आपकी यह विशेषता यहां देखी। ओम् का जप करें। इस
अनुभव होगी।
र नहीं आएंगे। अपनी योग्यता बताओ। योग्यता के बिना बाहरी दुनियां में जाने से अपनी हीनत
पाल जी ने कहा आपको देखकर मेरे सामने पुराने जमाने का दृश्य आ गया। गुरुकुलों का प्रकाश
ता स्वामी श्रद्धानन्द रूपी ज्योति से मिला है। हमें विदेशी भाषा का भी आश्रय लेना चाहिये । हम अपनी
सभ्यता र संस्कृति को न छोड़ें। जीवन के लिए वाह्य धन भी जरूरी है, परन्तु भारतीय संस्कृति में सण का
सार है। विद्वत्ता और आचार का पालन श्रेष्ठ है। इससे लोग आपको सात्विक भावना से देखेंगे। अपने को
यशस्वी बनाओ। पं सत्यदेव जी ने कहा-हरयाणा में क्षत्रिय जाति बसती है। यह इलाका वीर है। इस भूमि को
महात्माओं का आशीर्वाद प्राप्त है। शहर का नकली जीवन है, आपका असली जीवन है। यही आपका धन,
चरित्र और ज्ञान है। आप लोग सुखी रहें, दीर्घकाल तक जीवित रहें, यही कामना है।
२८ सितम्बर १९६३ को आचार्य भगवान देव जी ने उपदेश दिया। आदरणीय अध्यापकगण ! प्यारे
विद्यार्थियो ! बलदेव जी के आग्रह पर कुछ बोल रहा हूं। कई दिन से मेरा स्वास्थय खराब है। परन्तु सोचता हूँ
| कि काम करते-करते मरना अच्छा है। आर्ष शिक्षा प्रणाली का जो कार्य हमने प्रारम्भ किया है, वह पवित्र कार्य
है । यह वह ज्ञान है जिसे ब्रह्मा ने बृहस्पति को दिया, वृहस्पति ने इन्द्र को, इस प्रकार पीढ़ी दर पीढी ज्ञान प्राप्त
करने वाले ८८ हजार ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी ऋषि हुए हैं। यह महाभाष्य पढने वालों को पता ही है। ८८ हजार
ऋषियों में से केवल ८ ही ऋषि ऐसे हुए हैं जिन्होंने गृहस्थ जीवन बिताया। दास अपने मालिक की नकल
करता है। यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है। अंग्रेज गया, गुलामी गई, परन्तु एड़ी से चोटी तक मानसिक गुलामी भरी
हुई है।मुग़ल काल में राजपूतों ने मुसलमानों की गुलामी की, परन्तु एक सिसोदिया कुल इसका अपवाद रहा।
स्वार्थ का त्याग।

जिन्दा है जो मर चुका इन्सान के लिए।
मर चुका जो जिन्दा है अपने लिए।।
मेरे ब्रह्मचारी पेट के लिए कुत्तों की तरह मारे-मारे फिर रहे हैं। अंग्रेजी ढंग के बाल बनाते फिरें । वैदिक
मर्यादा और संस्कृति छोड़ रहे हैं इससे बढकर भी कोई पतित है। धर्म की ही विजय होती है। सत्यमेव जयते

नानृतम् ।

सत मत छोड़े सूरमा सत छोड़े पत जाय।
सत की बांदी लक्ष्मी फिर मिलेगी आय ।।